मोबाइल / नक़ल करते पकड़ने पर प्रोफेसर दण्डित : आई आई टी मुंबई मैं अति जातिवाद की नयी पराकाष्ठा

मोबाइल / नक़ल करते पकड़ने पर प्रोफेसर दण्डित : आई आई टी मुंबई मैं अति जातिवाद की नयी पराकाष्ठा

राजीव उपाध्याय

When I joined IIT / Kanpur in 1967 ,we were 312 in my batch . When due to selection in SCRA ( Railway like NDA ) I Left IIT in 1969, there were only 275 students left in my batch . Rest were found too slow in absorption in spite of having qualified with out coaching , reservation etc . No one questioned as exams were fair but tough . 5 CPI out of 10  was minimum required to continue in IIT . In last twenty years about 170 students have committed suicide in IITs . Intense competition is burning out students even before entry. CPGT reply is given below

IIT student suicides/deaths — what the data shows

Period Reported deaths Important qualification
2006–2015 51 Suicide + other unnatural deaths
2016–Sep 2026 120 Suicide + other unnatural deaths
2006–Sep 2026 171 82% reported as suicides
Estimated suicides ≈140 82% × 171

 

But in a most bizarre case Professor Dulla, caught a reserved category student using mobile ChatGPT (copying}  in exam . He later out of shame committed suicide . It is being painted obnoxiously as a caste discrimination . Professor , who did his duty well has been suspended and Director has offered to resign . It is a gross violation of sanctity of examinations in the most prestigious technical training institution in the  country and a most perverse definition of Caste  discrimination .

In fact, the very idea of mixing unsuitable and weak reserved category students with the brightest students in the country is preposterous for both . The reserved community student will feel humiliated daily as his intellectual disability will get exposed every day in class . It will lead to depression and as in this case adoption of unfair means to pass the examination. As I stated even otherwise many  suicides have taken place as coaching based entrants or others may not fit well in a class of real geniuses of the country.

If any thing it is a fit case for ending reservation in IITs . If people are so infatuated with name IIT , one  or two IIT may be reserved for such students where course duration  can be little longer and teaching slower . But at the end of the day an Engineer must know his job well.

The professor should be honourably given his job back and compensated for gross miscarriage of justice .

This article is based on a WhatsApp post given below and the on line information available .

बांगरू-बाण

श्रीपाद अवधूत की कलम से

खरी खरी… लोगों को भले ही लगे बुरी….

अभिनंदन, अभिनंदन अभिनंदन एक कायर, भीरू, तथाकथित सभ्य समाज मुझे क्या फर्क पड़ता है की वृत्ति वाला समाज के तौर पर हमारा हार्दिक अभिनंदन हैं…!!!
IIT बॉम्बे के प्रो. दुल्ला का निलंबन हो गया है, कल रात आईआईटी के डायरेक्टर ने इसकी घोषणा भी कर दी है।
साथ ही यह घोषणा करते हुए खुद आईआईटी बॉम्बे के डायरेक्टर प्रो. शिरीष केदारे ने भी अपना इस्तीफा देने की बात कही है।
100 से अधिक शोध पत्र, अपने नाम पर 6 पेटेंट, 12 सर्वोच्च पुरस्कार, उनके रिसर्च के 3700 से ज्यादा संदर्भ (साइटेशन्स) दिए जा चुके हैं, 13 से अधिक पीएचडी छात्रों को उन्होंने गाइड किया है। 40 साल से अधिक का प्रो. केदारे का करियर है।
खैर। लेकिन IIT बॉम्बे ने आंदोलनकारी छात्रों की मांग स्वीकार कर ली है।
पूरी तन्मयता से नकल करते वक्त उन्होंने छात्र को पकड़ लिया था, इसलिए प्रो. दुल्ला जैसे व्यक्ति के साथ यही होना चाहिए था। हिम्मत कैसे हुई उनकी ऐसा करने की? परीक्षा का पर्चा लिखते समय युवा छात्रों को एकाग्रता की ज़रूरत होती है और नकल करते वक्त वो भी ChatGPT की मदद से नकल करते समय तो दोगुनी एकाग्रता चाहिए होती है। ऐसे समय में प्रो. दुल्ला ने उसे पकड़कर उसकी एकाग्रता भंग करने की जुर्रत कैसे की? शर्म आनी चाहिए थी उन्हें…!
प्रो. दुल्ला, आप तुरंत चलते बनिए। प्रो. केदारे, आप भी निकलिए फौरन। IIT से बाहर जाइए। भारत से बाहर जाइए। यूरेशिया में जाकर बस जाइए क्योंकि आप मनुवादी विचारधारा के समर्थक हैं यहां आपकी कोई आवश्यकता नहीं है।
भारत को विलक्षण प्रतिभा की आवश्यकता नहीं है; भारत को केवल कॉकरोचों एवं झूठ की गूंज में सम्मिलित होने वाली ‘युवा प्रतिभा’ की ज़रूरत है। जो जरा जरा सी बात पर राष्ट्र के विरोध में खड़ी हो व्यवस्था के खिलाफ खड़ी हो हिंदू धर्म और सनातन सभ्यता को लतियाने के लिए खड़ी हो। आत्ममंथन करना वगैरह इन्हें सिखाया ही नहीं गया है,
और आगे से ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए प्रतिष्ठित संस्थानों को आरक्षण के साथ-साथ नकल को भी मान्यता दे देनी चाहिए। केंद्र सरकार देख ले अगर इस तरह का कोई कानून बनाया जा सके; छात्रों पर तनाव न आए, इसलिए नकल को कानूनी रूप देना ज़रूरी ही है, है न?
संस्थान में 80 परसेंटाइल लेकर आए छात्रों के स्तर का पेपर सेट किया जाए, इस नियम को अब बदल दिया जाना चाहिए। जो 30 परसेंटाइल लाकर आए हैं, उन्हीं के हिसाब से आसान पेपर सेट किया जाए। विरोध करने वाले छात्रों में से एक लड़की का रही थी कि आईआईटी बंबई में जातिवाद के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है इस कारण एक प्रोफेसर का निलंबन हो गया डायरेक्टर भी इस्तीफा देने की स्थिति में है, तो जेब में मोबाइल लेकर क्लास में पहुंचे छात्र को न पकड़ पाने के जुर्म में वहाँ के चौकीदार का भी इस्तीफा ले लिया जाना चाहिए।
दुनिया भर के उन सभी माता-पिताओं को भी अपने अभिभावकत्व से इस्तीफा दे देना चाहिए जो अपने बच्चों को पढ़ाकू नहीं बना सके। IIT में दाखिला तो मिल जाएगा, लेकिन आगे उस संस्थान की परीक्षाएं पास करने की औकात (क्षमता) अपने बच्चे में है या नहीं, यह माता-पिता को बिल्कुल नहीं देखना चाहिए।
जो छात्र चला गया उसे IIT से ज़्यादा अपने माता-पिता का डर था क्या, इस बात पर कभी किसी को विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि यह जाति की राजनीति में फिट नहीं बैठता।
IIT डायरेक्टर केदारे ने यह बयान दिया है, “हम सिर्फ अपना काम कर रहे थे। परीक्षा में नकल रोकना हमारा कर्तव्य है, हमें ऐसा लगा इसलिए हमने वह किया। लेकिन अगर आपको लगता है कि यह गलत है, तो मैं इस्तीफा देता हूँ। इस प्रकार के आंदोलनों में भाग लेकर आपका शैक्षणिक नुकसान न हो, आप यही समय अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में लगाएं, बस इसी सोच के साथ मैं पद छोड़ रहा हूँ।”

भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में जब भी कोई विवाद उठता है चाहे वह अनुशासनहीनता का मामला हो, अकादमिक विफलता का, या फिर गंभीर प्रशासनिक जांच का तो अक्सर मूल घटनाक्रम पीछे छूट जाता है और पूरा विमर्श सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ जाता है।
हमारे समाज की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हम हर जटिल समस्या का एक बेहद आसान और सुविधाजनक हल खोज लेते हैं उस पर पहचान का लेबल चिपका देते हैं।
यदि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में कोई छात्र नियमों का उल्लंघन करता है, परीक्षा की शुचिता भंग करता है या परिसर में शांति व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है, तो एक सामान्य और परिपक्व समाज की उम्मीद होती है कि नियम सबके लिए बराबर हों। लेकिन हमारे सार्वजनिक विमर्श का गणित अलग है। यहाँ अपराध या आचरण की गंभीरता इस बात से तय नहीं होती कि क्या हुआ था, बल्कि इस बात से तय होती है कि करने वाले की सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है..??
जब किसी छात्र की गलती को उसकी पहचान के पीछे छुपाकर सही ठहराया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नुकसान केवल उस नियम का नहीं हुआ, बल्कि उस पूरी शिक्षा प्रणाली का हुआ है जो निष्पक्षता और योग्यता की बुनियाद पर टिकने का दावा करती है।
मौन का अपराध: जब समाज गूंगा बनता है, तब संस्थाएं मरती हैं
किसी देश की शिक्षण संस्थाएं तब बर्बाद नहीं होतीं जब छात्र नकल करते हैं या अनुशासन तोड़ते हैं वे तब बर्बाद होती हैं जब पूरा समाज खड़े होकर इस अनैतिकता के पक्ष में ताली बजाने लगता है या सहमकर चुप बैठ जाता है।
IIT जैसे देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थान, जो पूरी दुनिया में अपनी साख और योग्यता (merit) के लिए जाने जाते हैं, यदि वहां नकल रोकने वाले शिक्षकों को अपराधियों की तरह कठघरे में खड़ा किया जाए और व्यवस्था उनके सम्मान की रक्षा करने के बजाय आत्मसमर्पण कर दे, तो यह हार सिर्फ दो प्रोफेसरों की नहीं है। यह हार उस हर ईमानदार नागरिक की है जो अपने बच्चे को मेहनत, सच्चाई और लगन की सीख देता है।
सुविधाजनक तटस्थता छोड़िए। किसी भी गलत काम को जाति, पंथ या राजनीति के तराजू में तौलना बंद करना कीजिए। गलत केवल गलत होता है, चाहे उसे करने वाला कोई भी हो।
यदि आज एक जागरूक समाज के रूप में हम नियमों की शुचिता, शिक्षकों के सम्मान और संस्थागत मर्यादा के पक्ष में मुखर होकर खड़े नहीं हुए, तो आने वाले कल में हमारी डिग्रियों की कोई कीमत नहीं रह जाएगी। संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा बनने से बचाइए; इससे पहले कि योग्यता की जगह सिर्फ ‘दबाव’ और ‘पहचान’ ही व्यवस्था की एकमात्र कसौटी बन जाए, अपनी आवाज़ उठाइए।

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