आज के परिपेक्ष व इन्टरनेट के युग मैं हिंदी दिवस : हार्दिक उदगार या सिर्फ
रस्म-अदायगी : राजभाषा
हेमंत कुमार
आज 14 सितंबर है, यानी कि हिंदी को राष्ट्र की राजभाषा घोषित करने की वर्षगांठ। 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को यह दर्जा दिया था, और इसके पीछे अहिंदीभाषियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा था – जैसे सुब्रह्मण्यम भारती, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी। यह नहीं था कि यह लोग उक्त समिति के सदस्य थे – बल्कि इन लोगों के जनता के बीच उद्गारों को, जो इस समिति के गठन के पहले ही दिए गए थे, समिति के सदस्यों ने माना और हिंदी का चयन किया।
यह बात कितनी दुखद है कि आज विभिन्न भाषाई अपनी अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाने के चक्कर में हिंदी को राजभाषा बनाने के पीछे रहे कारण को भूल गए हैं, जबकि राष्ट्र में हिंदी जानने वालों का प्रतिशत आज उस समय से कहीं अधिक है जितना उस समय था जब हिंदी को राजभाषा बनाया गया था।
आते हैं रस्म-अदायगी पर।
पहले 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता था। उस दिन हिंदी की प्रतियोगिताएं, गोष्ठियां, सेमिनार आदि आयोजित किए जाते थे। एक दिन के लिए – जी हाँ, केवल दिन भर के लिए – हिंदी का वर्चस्व रहता था, जैसे किसी का बर्थडे मनाया जा रहा हो। नए कपड़े पहनाए, कमरा सजाया, केक काटा, हैप्पी बर्थडे गाया, खाया-पिया, रिटर्न-गिफ़्ट लिया, और चलते बने। अगले दिन से फिर सब सामान्य। ऐसा प्रायः केंद्र-सरकार के सभी कार्यालयों में होता था।
कालांतर में हिंदी दिवस, हिंदी-सप्ताह में परिवर्तित हो गया। कार्यक्रम पूरे सप्ताह चलने लगा, बल्कि यूं कहें कि एक दिन में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को पूरे सप्ताह में बांट दिया गया। अब एक दिन तो किसी तरह ‘बरबाद’ किया जा सकता था, पूरा सप्ताह कैसे ‘बरबाद’ कर सकते हैं? आयोजन भव्य से भव्यतर होता गया, और उससे जुड़ाव उथले से और उथला होता गया।
फिर 1994 में यह निर्णय लिया गया कि सप्ताह भी कम है, अतः पखवाड़ा मनाया जाए। आयोजन और विस्तृत हो गए। प्रतियोगिताएं अधिक विषयों पर होने लगीं। कवि-गोष्ठियां, डिक्टेशन, शब्द-ज्ञान, वर्ग-पहेली आदि कार्यक्रम जुड़ गए। पता नहीं यह केवल मेरा ही अनुभव है कि आप सब का भी, जो केंद्र सरकार के उपक्रमों से जुड़े हुए हैं, कि ऐसी प्रतियोगिताओं में साल-दर-साल वही कुछ गिने-चुने लोग ही पुरस्कार पाते हैं। वैसे मेरा यह अनुभव विभिन्न स्थानों का रहा है जहाँ मैं दो-तीन वर्ष या अधिक तक रहा हूँ। प्रतियोगिता चाहे कोई भी हो, भाग लेने वाले चेहरे वही जाने-पहचाने होते हैं। बाकी लोग तो रस्म-अदायगी ही करते रहते हैं। वैसे मेरे विचार से ताली बजाने वालों की भी अहमियत कम नहीं होती, लेकिन फिर भी… भाग लेने वालों की जमात में तो इज़ाफ़ा हो।
मैं कई स्थानों में राजभाषा अनुष्ठान से जुड़ा रहा हूँ, और सदैव हिंदी के स्थान पर राजभाषा शब्द का प्रयोग करता रहा हूँ। इस बार भी सोचा कि हिंदी पखवाड़ा के स्थान पर राजभाषा पखवाड़ा मनाने का आदेश दूँ, पर गृह मंत्रालय की आधिकारिक वेब-साईट देखी तो वहाँ पर भी हर साल हिंदी दिवस संदेश ही देखा, राजभाषा पखवाड़ा संदेश नहीं। मैंने भी ऑफ़ीशियल लाईन पकड़ ली, और हिंदी दिवस संदेश ही दिया, यह बात अलग है कि आज रविवार होने के कारण सभी कार्यक्रम कल 15 सितंबर से आरंभ होंगे।
वैसे अंतर क्या है राजभाषा और हिंदी में? यदि हम परिभाषा देखें तो यही मिलेगा कि ‘संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है…’। अब जब राजभाषा हिंदी है तो हिंदी राजभाषा क्यों नहीं? कारण स्पष्ट है। राजभाषा का उद्देश्य आदेशों/ निर्देशों को विभिन्न कार्यालयों तक पहुँचाना है। यहाँ बोधगम्यता सर्वोपरि है, शुद्धता गौण। अतः यदि प्रचलित अंग्रेज़ी शब्दों को देवनागरी में लिख दें, तो शायद हिंदी की दृष्टि से ठीक न हो, पर राजभाषा की दृष्टि से बिलकुल मान्य है। हाँ, यदि अंग्रेज़ी के पूरे वाक्यों अथवा वाक्यांशों का केवल लिप्यांतरण कर दिया जाए तो हास्यास्पद लगेगा।
हिंदी पखवाड़े के दिनों में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं… लोग संकल्प लेते हैं कि सप्ताह में एक दिन केवल हिंदी में कार्य करेंगे। मैंने लोगों को दबी ज़ुबान में यह भी कहते सुना है कि फिर तो उस दिन तो कोई कार्य नहीं होगा। यहाँ तक कि हिंदी में हस्ताक्षर करने का आग्रह भी केवल आग्रह ही रह जाता है… जबकि यह बहुत सरल है। 1979 के अगस्त के बाद से किसी सरकारी कागज़ पर मेरा हस्ताक्षर हिंदी को छोड़ कर किसी अन्य भाषा में नहीं हुआ, चाहे कागज़ किसी भी भाषा का रहा हो।
मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि आज के सभी सरकारी कर्मचारी स्वतंत्र भारत में जन्मे हैं, अर्थात् जब अंग्रेज़ भारत छोड़ चुके थे, तो उनके द्वारा छोड़ी गई अंग्रेज़ी की बेड़ियों से हम अपनी मानसिकता को क्यों नहीं छुड़ा पा रहे हैं? यहाँ मेरा तात्पर्य अधिकारी वर्ग से है, जो अंग्रेज़ी के मोहपाश में अभी भी फंसा लगता है। शायद एक कारण यह है कि अभी तक हम हिंदी को दिल से नहीं अपना सके हैं। जब एक सिख तमिलनाडु में कार्य करते करते तमिल बोलने लगता है, एक मलयाली मुंबई में फ़र्राटेदार मराठी बोलने लगता है, एक विदेशी राजनयिक धाराप्रवाह हिंदी बोलने लगता है, हमारे प्रधानमंत्री अन्य देशों के प्रतिनिधिमंडल के साथ हिंदी में वार्ता करते हैं, तो हम अधिकारी वर्ग के लोग अपना अंग्रेज़ी प्रेम क्यों नहीं छोड़ पाते? ऐसे अधिकारी कतिपय ही हैं जो हिंदी में कार्य करने में गौरव अनुभव करते हैं।
प्रति वर्ष यही होता है। एक दिन… एक सप्ताह… या एक पखवाड़ा… हम हिंदी की बातें करते हैं… कुछ दिन हिंदी को याद करते हैं… शायद पूजते भी हैं… और फिर गणपति की तरह (या दुर्गा या किसी अन्य देवी-देवता की प्रतिमा की भांति) विसर्जित कर देते हैं – इस विश्वास और आश्वासन के साथ कि अगले वर्ष पुनः स्थापित करेंगे। प्रतिमा के साथ हमारी आस्था और परंपराएं जुड़ी होती हैं… और हिंदी के विसर्जन के साथ हमारी उपेक्षा।
फिर यह आयोजन केवल रस्म-अदायगी नहीं तो और क्या है?
एक कुण्डलिया तो बनती है…
राजभाषा
हिंदी को दिल में रखें, पूरा दें सम्मान,
मुश्किल है कुछ भी नहीं, यदि लें मन में ठान।
यदि लें मन में ठान, छोड़ देवें अंग्रेज़ी,
नहीं घटेगी स्पीड, काम में होगी तेज़ी।
कह ‘धाकड़’ कविराय, जबकि हम सब हैं हिंदी,
कामकाज में फिर क्यूं ना अपनाएं हिंदी??
