मैं तुलसी तेरे आँगन की…  तुलसी महात्म्य

मैं तुलसी तेरे आँगन की…  तुलसी महात्म्य

        हेमंत File:Shri Hemant Kumar appointed as new Member Mechanical, Railway Board & Ex-officio Secretary to the Govt. of India on January 13, 2015.jpg - Wikimedia Commons

ब्लॉग की इस कड़ी का शीर्षक 1978 में निर्मित एक प्रसिद्ध हिंदी फ़िल्म से लिया है, लेकिन चिंता न करें, मैं उस फ़िल्म के बारे में बात नहीं करूँगा। आज का विषय है पवित्र तुलसी।

बचपन से ही तुलसी के बारे में सुनते और देखते आए हैं। जब ददिहाल, मिर्ज़ापुर, जाते थे तो आँगन में तुलसी का एक पौधा देखते थे जिस पर दादी नित्य-प्रति जल चढ़ाती थीं। दिया भी जलाती थीं। हमारे अपने घर में तो कोई तुलसी का पौधा था नहीं – कम से कम जिस भांति ददिहाल में था वैसा तो बिलकुल नहीं। नौकरी करने और फ्लैटों में जाने के बाद तो आँगन भी नहीं रहा। सरकारी सेवा-काल में तो कई जगहें बदलीं, घर बदले, और कहीं कहीं तुलसी के पौधे भी लगे मिले लेकिन जिस परंपरा का निर्वाह दादी करती थीं, वैसा मैंने अपने आस-पास नहीं देखा। मैंने यह सुना था कि तुलसी को माँ का स्थान दिया गया है।

तुलसी क्या है

तुलसी का वैज्ञानिक नाम है ओसिमम टेनुइफ़्लोरम है और अंगरेज़ी में इसे होली बेसील (Holy Basil) कहते हैं। अरबी भाषा में इसे रेहान कहते हैं। आश्चर्य यह है कि इसे हिंदुओं, इसाईयों, तथा मुसलमानों  सभी द्वारा पवित्र माना जाता है।

यूनानी (ग्रीक) भाषा में तुलसी के लिए प्रयुक्त नाम वेसेलिको मूल रूप ले बेसिलियस शब्द से बना है जिसका अर्थ है राजा या राजसी। कहते हैं कि रानी हेलेना ने ईसा-मसीह का मूल सलीब (क्रॉस) का पता उसके लिए एक अनजान सुगंध का पीछा करते हुए लगाया था, जो वास्तव में तुलसी की सुगंध थी। यूनानी, रोमन तथा सर्बियन चर्च तुलसी को बहुत पवित्र मानते हैं और चर्च की वेदी (आल्टार) के नीचे उसका पौधा रखते हैं और कुछ महत्वपूर्ण अवसरों पर तुलसी को उपस्थित समुदाय में बांटते भी हैं।

क़ुरान में भी तुलसी (रेहान) के बारे में उल्लेख है और उसका संबंध पवित्रता और शुचिता के पुरस्कार से है (सूरा अल-वाक़िया 56:89)*। स्वयं पैगंबर मुहम्मद साहब ने इसे अच्छी सुगंध और स्वर्ग की खुशियों में सम्मिलित किया है (हदीस)*।

(* गूगल के अनुसार)

चीन की औषधीय पद्धति में भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है और शेन-टॉनिक के रूप में प्रयोग किया जाता है। फेंग-शुई में इसका उल्लेख सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य, व शांति के संदर्भ में है।

लास्तु-शास्त्र के अनुसार तुलसी का पौधा ईशान कोण (घर के उत्तर-पूर्व दिशा) के कोने में लगाना चाहिए।

तुलसी के नाम और प्रकार

हिंदुओं में तुलसी की बहुत महिमा है। तुलसी अष्टोत्तर शतनामावली में तुलसी के 108 नाम दिए गए हैं। सारे लिखना आरंभ कर दूँ तो लेख बहुत बड़ा हो जाएगा। कुछ प्रमुख नाम हैं –

विष्णुप्रिया (भगवान विष्णु की प्रिय), वृंदा, नंदिनी (लोगों को आनन्द देने वाली), विश्वपूजिता (विश्व द्वारा पूजी जाने वाली), कृष्ण-जीवनी (जो कृष्ण जी का जीवन है), विश्व-पावनी (विश्व को पावन करने वाली), तुलसी (जिसकी तुलना न की जा सके), पुष्पसारा (सारे फूलों में श्रेष्ठ) आदि। लोग देव-उठान एकादशी के दिन तुलसी के 108 नामों का जाप करते हैं।

तुलसी के कई प्रकार हैं। प्रमुख प्रकार हैं – राम तुलसी (जो सर्वाधिक प्रचलित है और पत्तियां हल्के हरे रंग की तथा कोमल होती हैं), श्यामा तुलसी (पत्तियां बहुत गहरे गरे, काले, या बैंगनी रंग की होती है, और प्रायः मिल जाती है), वन तुलसी (तीव्र सुगंध वाली और अपेक्षाकृत सख़्त पत्तियां तथा बैंगनी तने इसकी पहचान हैं, और यह कई जगह अपने आप उग आती है), कपूर तुलसी (इसकी पत्तियों से कपूर की सुगंध आती है, तथा यह अंडाकार होती हैं और किनारे नुकीले होते हैं), तथा मरुआ तुलसी (इसकी पत्तियां बड़ी, अंडाकार, आगे से थोड़ी नुकीली और चिकनी तथा कोमल होती हैं, और उन्हें मसलने पर पुदीना और लौंग की मिलीजुली सी सुगंध आती है)। दवाइयों की कई दुकानों में पंच-तुलसी अर्क मिलता है। लोग कहते हैं कि इसकी पाँच बूंदे गरम पानी में डाल कर प्रातः पीने से सर्वांगीण लाभ मिलता है। इन सभी प्रकार की तुलसियों के वैज्ञानिक नाम भिन्न हैं जबकि वर्गीकरण (क्लास) एक ही है।

पहचान के लिए मेरे द्वारा खींचे गए कुछ चित्र साझा कर रहा हूँ जो पौधे हमारी कॉलोनी में ही उपलब्ध थे, और आज सुबह ही मेरे एक मित्र ने मुझे दिखाए थे, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। कपूर तुलसी और वन तुलसी आस-पास नहीं दिखीं। भविष्य में उनके दर्शन हुए तो अवश्य उनके चित्र भी लगा यहाँ लगा दूँगा।

तुलसी के बीज को मंजरी कहते हैं। कुछ लोग मंजरी का भी सेवन उसमें निहित औषधीय गुणों के कारण करते हैं। प्रायः तुलसी का पौधा अपने आप बढ़ता रहते है क्योंकि पौधे से गिरी मंजरी नए पौधों के रुप में विकसित हो जाती है।

तुलसी के तने के सूख जाने पर उसके मनके (मोती के आकार के टुकड़े अथवा बीड) बना कर तुलसी की माला बनाई जाती है जो जाप करने में एक मानक है क्योंकि उसमें 108 मनके होते हैं और एक अन्य मनका एक मनके के ऊपर बांधते हैं जिसे सुमेरु कहते हैं और जिससे आँखें बंद करने पर भी, या माला के किसी प्रकार से छिपे होने पर (प्रायः माला जाप से समय दिखनी नहीं चाहिए) भी 108 बार की माला के अंत पता लग जाता है। नियमानुसार माला फेरते समय सुमेरु को लाँघते नहीं हैं बल्कि सुमेरु पर उंगली आने पर माला की दिशा बदल देते हैं अथवा माला पलट देते हैं जब तक कि सुमेरु पुनः उंगलियों में नहीं आता। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि जितनी माला फेरने का निश्चय किया था वह पूरी न हो जाए, यथा दस माला, या ग्यारह माला।

तुलसी विवाह

तुलसी विष्णु जी की प्रिय क्यों है इसके विषय में पद्म पुराण में तथा कुछ अन्य ग्रंथों में एक प्रसंग दिया है। कथा कुछ इस प्रकार है-

शिव जी के क्रोध की ऊर्जा से समुद्र में एक दैत्य उत्पन्न हुआ था जिसके कारण उसका नाम जालंधर पड़ा। कालनेमि दैत्य की पुत्री वृंदा विष्णु जी की परम भक्त थी। उसका विवाह जालंधर से हो गया। वह पतिव्रता स्त्री थी। पत्नी के पतिव्रत धर्म के प्रताप से जालंधर अजेय हो गया था और घमंड में उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवता हारने लगे, क्योंकि जालंधर के युद्ध के लिए प्रस्थान के साथ ही वृंदा पूजा पर बैठ गयी थी, इस संकल्प के साथ कि पति के वापस आने पर ही वेदी से उठेगी। देवताओं में त्राहि-त्राहि मच गयी। कुछ भाग कर विष्णु जी के पास आए कि इस संकट से उबारें। विष्णु जी ने पहले तो मना किया क्योंकि वृंदा उनकी भक्त थी, लेकिन देवताओं की दशा देख कर मान गए।

विष्णु जी ने जालंधर का रूप धरा और वृंदा के महल में उसके पास गए। पति को आया समझ कर उसने पूजा की वेदी से उठ कर उनके पैर छुए। उधर पतिव्रत धर्म के भंग होते  ही जालंधर की शक्ति क्षीण पड़ गयी और देवताओं ने उसका सिर काट दिया। वह सिर वृंदा के पास आ कर गिरा। वह चकित रह गयी कि पति तो सामने खड़ा है तो उसका कटा सिर भी सामने कैसे आया। वह समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है। विष्णु जी अपने रूप में आए और वृंदा के सामने लज्जित थे। वृंदा ने उन्हें श्राप दिया कि वे पत्थर के हो जाएँ। उसके प्रभाव से वह पत्थर हो गए (शालिग्राम के रूप में)। उन्होंने वृंदा को वरदान दिया कि वह तुलसी के रूप में फिर आएगी और विष्णु जी उसे सदैव अपने साथ रखेंगे।

वृंदा की चिता की राख जहां गिरी वहाँ एक पौधा उगा जिसका नाम तुलसी रखा गया। तब से विष्णु जी की पूजा में तुलसी का होना आवश्यक है। कहते हैं कि जब तक प्रसाद में तुलसी नहीं डाली जाए, वह उसे ग्रहण नहीं करते।

वृंदावन वास्तव में तुलसी का वन है जहां बाँके बिहारी क्रीड़ा करते थे।

देवउठान एकादशी के दिन तुलसी-विवाह की प्रथा है जिसमें तुलसी के पौधे के साथ विष्णु जी के शालिग्राम (पत्थर) रूप के साथ विवाह करवाया जाता है। यह उसी कथा से प्रेरित है।

एक मान्यता के अनुसार तुलसी को दैवीय पौधा मानते है, जसकी ऊपरी शाखाओं में देवता निवास करते हैं, तने में वेद, तथा जड़ों में सभी पावन नदियाँ निवास करती हैं।

तुलसी के औषधीय गुण

तुलसी में कई प्रकार के ऐंटीऑक्सीडेंट, विटामिन ए तथा के, और कई आवश्यक तेल (एसेंशियल ऑयल) होते हैं जो तरह-तरह के रोगों में लाभदायक होते हैं। इसके कुछ गुण निम्नवत् हैं –

  • प्रतिरक्षा प्रणाली वर्धक (इम्यून सिस्टम को बढ़ाना)
  • जीवाणुरोधक व विषाणुरोधक (ऐंटी बैक्टीरियल, व ऐंटी वायरल)
  • दाँतों की सड़न को रोकना
  • मानसिक तनाव कम करना
  • स्मृति-हानि को कम करना (डिमेंशिया में लाभदायक)
  • चिंता कम करना (ऐंटी-डिप्रेसेंट)
  • रक्तचाप नियंत्रण
  • रक्तशर्करा (ब्लड शुगर) नियंत्रण
  • रक्त के थक्के बनाने में सहायक (विटामिन ‘के’ के कारण)
  • हड्डियों का घनत्व बढ़ाना (बोन-डेंसिटी)
  • श्वसन संबंधी विकारों में लाभदायक
  • त्वचा व घाव में इसका लेप लगाने से लाभ होता है (अन्य सभी के लिए खाना होता है)

गूगल ने बताया कि आयुर्वेद में इसके पत्ते चबाना मना किया गया है और उन्हें पूरा निगल लेना निर्दिष्ट है, जबकि मैं बचपन से ही पत्ते चबा कर खाता रहा हूँ और मुझे उनका स्वाद भी अच्छा लगता हैं। दाँत भी अभी तक ठीक हैं, जबकि कहा गया है  कि इसके अवयव दाँतों के इनेमल को हानि पहुँचा सकते हैं। हाँ, आजकल तो प्रातः उठ कर तुलसी के अर्क की पाँच बूँदें गुनगुने पानी में डाल कर पीता हूँ।

इतने गुणों के साथ तुलसी को माँ का स्थान देना उचित ही है। वह माँ की भांति ही हमारी रक्षा करती है।

आँगन में तुलसी

हिंदुओं में एक प्रथा रही है कि घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाते हैं और नित्य उस पर जल अर्पण करते हैं, जैसा मैंने लेख के आरंभ में अपने ददिहाल के विषय में लिखा था। प्राचीन समय में कई परिपाटियों को धार्मिक रूप इसलिए दे दिया जाता था जिससे बेपढ़े लोग भी उसे आसानी से मान सकें। वास्तव में इस प्रथा के पीछे तुलसी के औषधीय गुण होंगे, जिससे किसी बीमारी पर प्रथम उपचार के रूप में तुलसी का प्रयोग किया जा सके, जब तक वैद्य नहीं आ जाते। तुलसी आसानी से मिल जाए इसलिए ही उसे आँगन में लगाया जाता होगा और नित्य देखरेख की जाती होगी। कालांतर में वह धार्मिक प्रथा बन गयी।

मैंने इस कड़ी के शीर्षक वाली फिल्म नहीं देखी है और सोचा था कि कथानक में तुलसी को इसी संदर्भ में दिखाया गया होगा कि कैसे कोई स्त्री अपने परिवार की रक्षा मे सदैव तत्पर रहती है – एक ढाल की भांति।

मैंने कथानक के विषय में गूगल से जानकारी ली तो पता लगा कि मेरी सोच ग़लत थी, क्योंकि फिल्म पूरी तरह बंबइया फॉर्मूला पर थी और उसमें तुलसी नामक एक (दूसरी) स्त्री, उसके पुत्र, तथा विवाहिता स्त्री के बारे में है।

अंत में एक पारंपरिक कुण्डलिया तो बनती है।

घर में  तुलसी  राखिए,  बहुत  करे  उपचार,

जिस घर में तुलसी बसे, स्वस्थ रहे परिवार।

स्वस्थ  रहे   परिवार, न  मांगे   मंहगी  सेवा,

पाँच   पत्तियाँ   नित्य,  चबाओ  जैसे   मेवा।

कह ‘धाकड़’ कविराय, रोग  के रहो न डर में,

भेजो यह  संदेश, कि तुलसी हो घर-घर में।।

‘धाकड़’
3 जून 2026

Filed in: Articles, धर्म, संस्कृति

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