नववर्ष पर मैं क्यों हर्षित नहीं हो पता हूँ ? नव वर्ष का हिन्दू , बौद्ध ,मुस्लिम , ईसाई व सिख इतिहास व हमारे त्यौहार

नववर्ष पर मैं क्यों हर्षित नहीं हो पता हूँ ? नव वर्ष का हिन्दू , बौद्ध ,मुस्लिम , ईसाई व सिख इतिहास व हमारे त्यौहार

राजीव उपाध्याय

अब ७५ वर्ष की आयु मैं ३१ दिसंबर का दिन व रात मैंने सामान्य दिनों की तरह रजाई मैं मुफ्त के यू ट्यूब के प्रोग्राम देखते हुए बिताई . कोई उत्साह या उमंग नहीं थी . इसके विपरीत आज भी दशहरे का रावण जलने मैं और दिवाली पर राकेट और चरखी / अनार चलाने मैं बड़ा मज़ा आता है . होली का भी इंतज़ार करते हें . बाकि त्यौहार जैसे राम नवमी , जन्माष्टमी , शिव रात्रि , रक्षा बंधन , दुर्अगा पूजा ब कर्तव्य मान कर मनाते हें अपनी संस्कृति को अक्षुण्य रखने के लिए . सिख बैसाखी , मुसलमान एक जनवरी को बुरा मानते हें उनका नया वर्ष मुहर्रम से शुरू होता है . बुद्ध भी १४ जनवरी को नव वर्ष मानते हें .

इन सब मैं ३१ दिसंबर गायब हो गया . पहले रेलवे की नौकरी मैं हर क्लब मैं नया साल का फंक्शन होता था , बच्चों के साथ जाते थे . बच्चे के कुछ खेल , म्यूजिकल चेयर , हाऊजी मैं आधी रात तक क्लब मैं बैठ कर सब को नव वर्ष कि बधाई देकर सोने जाते थे . दर्जनों ग्रीटिंग कार्ड भेजते थे .

फिर धीरे धीरे एक प्रश्न उभरा कि नव वर्ष से हमारा क्या लेना देना ? यह तो विदेशी त्यौहार है तो बेगानी शादी मैं अब्दुल्ला क्यों दीवाना हुआ जा रहा है ?

भारत तो छोडो खुद अँगरेज़ क्लाईव कि दक्षिण मैं अर्काट  कि १७५१ कि जीत तक एक जनवरी को नव वर्ष नहीं मानते थे . उन्होंने १७५२ मैं पहली जनवरी को नव वर्ष माना था . उसके पहले जुलियन कैलेंडर मैं नव वर्ष मार्च मैं आता था . यद्यपि बाकि युरोप ने १५०० – १६०० तक ग्रेगारियन  कैलेंडर मान लिया था .

चलिए अब ईसाईयों  की बात करते हें . एक जनवरी को ईसा का जन्म दिन मानते हें और इसे सबसे बड़े त्यौहार की तरह मानते हें . कैलेंडर भी ईसा के जन्म से शुरू करते हें . पर orthodox christian celebrate circumcision of christ even now which is nine days later .

हमारा इस सबसे क्या वास्ता ?

हमारा पुराना मुख्य कलेंडर महाभारत के युधिष्टिर के राज्याभिषेक से शुरू होता है . जो ईसा के जन्म से ३१०० से भी अधिक साल पुराना है . कलियुग का प्रारंभ युधिष्टिर के काल मैं ३१०२ इसा पूर्व हुआ था .अनेक शिला लेखों मैं युधिष्टिर संवत का उल्लेख आता है . उसके बाद विक्रम संवत सबसे अधिक प्रचलित हुआ और शक संवत सरकार का अधिकृत संवत है .

हमारे नव वर्ष के त्यौहार अधिकतर कृषि व फसलों के काटने पर आधारित हें और उन मैं किसानों का हर्ष स्वाभाविक है . सबसे अधिक प्रचलित चैत्र शुक्ल  प्रतिपदा सृष्टि के प्रारंभ से सम्बंधित है . दिवाली का लक्ष्मी पूजन सागर मंथन से लक्ष्मी  के प्रकट होने से सम्बंधित है . बैसाखी , बिहू , पोंगल , गुडी पर्व  फसलों के त्योहार  हें .

शहरी संस्कृति टीवी इत्यादि से बहुत प्रभावित है . अनेक वर्ष मैंने कनाट  प्लेस मैं ३१ जनवरी की रात को मेला और सवेरे टूटी शराब को बोतलों से सड़कें पटी देखि हें . पर किसी भी शादी मैं माहोल कहीं अधिक खुशनुमा होता है पर सामाजिक बंधनों और रिश्तों मैं होता है .

बड़े शहर कि संस्कृति उन्मुक्त जीवन शैली को पसंद करने लगी है . मुझे उम्र के साथ रिश्तों के बीच ज्यादा अच्छा लगने लगा है . दोस्त तो सब बिखर जाते हें रिश्ते तब भी रह जाते हें .

इसी लिए सोचने लगा हूँ कि मैं अंग्रेजी नव वर्ष क्यों मनाऊँ जब की दिवाली होली का मुझे इंतज़ार रहता है .

पर लोक लाज मैं नव वर्ष की शुभ कामनाएं सबको कहता हूँ आपको भी नव वर्ष मुबारक !

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