भारत को रक्षा उपकरणों की खरीददारी को दुगना करना चाहिए और फ्रांस और           अफ़ग़ानिस्तान की तरह एक अचानक हार के बाद भी लम्बी लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए .

न्यूयार्क के मेयर व दस अमरीकी सांसदों का उम्र खालिद को छुडाने का          कुप्रयास , धुरंधर का खाड़ी देशों का प्रतिबन्ध और वेन्ज़ुएला पर हमला : भारत को रक्षा उपकरणों की खरीददारी को दुगना करना चाहिए और फ्रांस और           अफ़ग़ानिस्तान की तरह एक अचानक हार के बाद भी लम्बी लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए .

Rajiv Upadhyay

भारत के लिए नए साल की शुरुआत एक खतरे कि घंटी से हुई है . उम्र खालिद पर सर्वोच्च नय्यालय के फैसले से ठीक पहले न्यूयार्क के नए मेयर मामदानी व दस अमरीकी सांसदों ने उम्र खालिद के पक्ष मैं बयान जारी कर भारत के आतंरिक मामलों मैं गंभीर हस्तक्षेप कि एक और कड़ी जोड़ दी है . इसके पहले इमरान खान व शेख हसीना कि बांग्लादेश मैं सरकार बदलने मैं पूर्ण सफलता पायी है . यह काम पुरानी  परिपाटी से आतंरिक जयचंदों और मीर जाफरों कि मदद से ही होता है . पर वेनेज़ुएला मैं तो बिना किसी आपत्तिजनक कार्यवाही के वहां के राष्ट्रपति को गिरफतार  करना एक घोर उपनिवेशवादी मानसिकता का परिचायक है .

भारत मैं आज भी हज़ारों जयचंद विदेशी पैसों के लिए मातृभूमि  का सौदा कर रहे हें . फरीदाबाद यूनिवर्सिटी मैं डोक्टरों का टोला ओपरेशन के बाद बम बना रहा था कौन सोच सकता था ? ऐसे कितने गजवा ए हिन्द के समर्थक आतंकी १९४७ के Direct Action Day की तरह ISIS कि तरह अत्यंत वीभत्स तरीके से हिन्दुओं मैं इतना डर पैदा करने की कोशिश करेंगे कि हम डर कर उनका शासन स्वीकार कर लें .

उधर चीन . पाकिस्तान व बांग्लादेश मिल कर एक साथ हमला करने का स्वपन देख रहे हें क्योंकि स्वयं युनुस ने ग्रेटर बंगला देश के नक़्शे वाली किताब खुद बांटी हैं .

भारत का रक्षा बजट पेंशन व वेतन के बाद मात्र १० – २० बिलियन डॉलर कि रक्षा सामग्री  खरीदने लायक है जो बहुत कम है . 1996 मैं सुखोई ३० का दाम मात्र ५० मिलियन डॉलर था . आज रफाले का दाम बिना हथियारों के २८४ मिलियन डॉलर है . इसलिए यदि हम सात प्रतिशत कि दर से रक्षा बजट बढ़ाते हें तो अब हमेशा चीन की हर धमकी से डरते रहेंगे . पनडुब्बियों का भी यही हाल है . भारत को अब एक मुश्त रक्षा सामग्री कि अगले दस वर्षों तक खरीददारी दुगनी करनी होगी और इतना सशक्त तो बनना होगा कि चीन मात्र धमकाने  के लिए गलवान या तवांग पर हमला न करे .

इसी तरह जब अफ़ग़ानिस्तान पर रूस का कब्ज़ा हुआ तो सारा मुस्लिम जगत एक जुट होकर उसे मुक्त करने मैं लग गया . पर सबसे प्रशंसनीय उनके सामान्य नागरिकों के गुलामी न करना का दृढ निश्चय था जिसने हर महा शक्ति को हरा दिया . फ्रांस मैं भी हिटलर के कब्ज़े का बाद एक सशक्त रेजिस्टेंस मूवमेंट शुरू हो गया था . पर वेनेज़ुएला कि जनता अफगानिस्तान की तरह      साहस नहीं दिखा पायी. तुर्की कि जनता तो  टैंक के आगे लेट गयी थी . जब हम इमरजेंसी का विरोध भी नहीं कर सके तो Direct Action Day का विरोध नहीं कर पाएंगे !

हमारा हार कर सँभलने का इतिहास नहीं है . गौरी पृथ्वीराज से हार कर अगले साल फिर जीत जाता है पर हम न अलाउद्दीन , न ही अब्दाली न अंग्रेजों के खिलाफ न ही डायरेक्ट एक्शन  डे  के खिलाफ एक जुट हो कर लड़ सके . पहले राजपूत या मराठा धर्म की रक्षा के नाम पर लड़ लेते थे अब वह भी नहीं होगा क्योंकि अब सब जीवन का अर्थ धन ही समझते हें .

इसलिए हम को अचानक हमले की पहली हार के बावजूद  फिर एक जुट होकर वापिस हमला करने की प्लानिंग करनी होगी देश के अन्दर और बाहर दोनों दुश्मनों के खिलाफ .

यह अभी हमारे लिए नयी सोच है . अपनी श्रेष्ठता  का झूठा अत्यधिक प्रचार हमें सुस्त बना कर गुमराह कर रहा है . वास्तविकता कहीं अधिक भयावह है . हमारी नीतियों से कोई हमारा वास्तविक मित्र नहीं है न ही हम किसी के मित्र हें . इस लिए हमारी किसी भी लड़ाई मैं कोई हमारा साथ नहीं देगा . इसलिए शीघ्र ही समर्थ  व स्बवाबलंबी  होकर हमें अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी .

दूसरा विदेशी हमारी धर्म , भाषा ,जाती इत्यादि के मतभेदों का फायदा उठाएंगे . इस लिए विदेशी दुष्प्रचार  व  शांति प्रियों  को बुरा लगने पर भी हमें देशद्रोहियों को  उतनी ही बर्बरता से जबाब देना होगा जैसे महाराजा रंजित सिंह के सेनापति नलवा ने दिया था . आधुनिक काल मैं योगी आदित्यनाथ ने दिखा दिया है कि इच्छा शक्ति होने से हम आतंकियों का सफाया कर सकते हें .

प्रश्न अब जागने का है . फरीदाबाद , गलवान और वेनेज़ुएला के बाद भी अगर हम नहीं जगे तो कब जागेंगे ?

आदरणीय दिनकर जी पंक्तियाँ आज फिर याद करने की आवश्यकता है .

मत रोक युधिष्ठिर को न आज

जाने दे उनको स्वर्ग धीर

लौटा दे मुझे गांडीव गदा

लौटा दे अर्जुन भीम वीर

इश्वर हमें सद्बुद्धि दे !

 

 

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