Indian FTAs And Indo – ASEAN Trade Tragedy: इतने सारे भारतीय ऍफ़ टी ए व्यापार समझौते कहीं भारत के गले की फांस तो नहीं बन जायेंगे .
आज भारत यूरोप , अमरीका , न्यूजीलैंड सहित अनेक देशों से मुक्त व्यापार समझौते कर बहुत आशावान है . परन्तु यदि इतिहास देखें तो पुराने मुक्त व्यापार समझौतों से भारतीय व्यापरियों को बहुत नुक्सान ही हुआ है . इनमें सबसे ख़राब तो ASEAN देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता था .
२०१० से पहले भारत का आसियान देशों के व्यापार से २५ बिलियन डॉलर का निर्यात और तीस बिलयन डॉलर का आयात होता था . २०२२ मैं यह व्यापार का घाटा बढ़ कर — हो गया क्योंकि हमारे निर्यात मात्र ४४ बिलयन डॉलर हुए और आयात ८७ बिलियन डॉलर हो गया इस लिए व्यापार घाटा ढाई गुना बढ़ गया. इस के अनेक कारण हो सकते हें पर अंततः सत्य यह है कि इन समझौतों से भारत को भयंकर नुक्सान हुआ .
इसी तरह बिम्सटेक देशों ने भी भारत को नुक्सान ही पहुंचाया . लोग नेपाल , थाईलैंड इत्यादि से चीनी सामान लाने लगे . भारतीय कंपनियों ने बांग्लादेश मैं फक्ट्रियां लगा कर भारत को माल भेजना शुरू कर दिया . इसी तरह नेपाल मैं मलेशिया का ताड़ का तेल रिफाईन कर भारत बेचने का प्रयास होने लगा .
इसके बावजूद भारत और संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रलिया के मुक्त व्यापार समझौता सबको बहुत लाभ दायक सिद्ध हुआ . इसी से भारत ने यूरोप और न्यूजीलैंड के साथ समझौता कर लिया . अब अमरीका के साथ सौदे कि परतें पूरी तरह खुली नहीं हें . परन्तु इससे भारत को बहुत लाभ होने की उम्मीद कम है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी व्यापारी हें और भारत को दबाने कि स्थिती मैं हें . मजबूरी के समझौते हम सिर्फ अपनी जान बचा सकते हें लाभ शायद ही दें . यूरोप से कुछ लाभ की उम्मीद जरूर है .
परन्तु भारतीय कपड़ा उद्योग बांग्लादेश की बहुत कम वेतन और विएतनाम कि बेहतर गुणवत्ता का कितना मुकाबला कर पायेगा यह तो भविष्य बतलायेगा परन्तु मुक्त व्यापार समझौता अपने प्रतिद्वंदियों से आगे नहीं ले जा सकता . पाकिस्तान और बांग्लादेश हमसे सिर्फ एक प्रतिशत ज्यादा सीमा शुल्क देंगे . यह कोई बड़ा पैसा नहीं है . इतना तो वह अपना वेतन घटा देंगे . इसलिए भारत को कितना फायदा होगा यह तो समय ही बताएगा .
सत्य यह है कि जब मन मोहन सरकार ने कंट्रोल हटाये थे तो भारतीय उत्पाद विश्व बजा मैं बहुत तेजी से बिके थे , गत वर्षों मैं हमारी औद्योगिक कुशलता घटी ही है और विएतनाम ने तो हमें चारों खाने चित्त कर दिया है .
इस लिए इन मुक्त व्यापार समझौतों से कोई लाभ बिना रेफिर्म के नहीं मिलेगा . भारतीय भ्रष्टाचार , लेबर कानून , जमीन की कीमत , टैक्स , बैंक क़र्ज़ पर ब्याज़ की दरें दि सब मिला कर हमारी औद्योगिल क्षमता को घटाते हें . इसके अलावा बड़े भारतीय व्यापारी और उद्योगपति कम्पटीशन के आदी नहीं हें और उससे बचते हें . टाटा , बजाज इत्यादि कुछ अपवाद हें पर मूलतः हम सरकारी बचाव के आदि हें और हमारा माल घटिया और मंहगा है . इसलिए हमें अब भारतीय उद्योगों की मूल समस्यायों को भी सुलझाना होगा .
अन्यथा यह मुक्त व्यापार समझौते ASEAN की तरह हमारे गले की फाँस ही बन कर रह जायेंगे .
छब्बे बनने के चक्कर मैं हम चौबे से कहीं दूबे ही न बन जाएँ !


