तिलचट्टों का नहीं बल्कि आयातित दीमकों का देश को खोखला करने का आन्दोलन है परन्तु राष्ट्र को अधिक आदर्शों के प्रति समर्पित शासनतंत्र , अधिक विश्वास एवं जबाबदेही  की आवश्यकता है .

तिलचट्टों का नहीं बल्कि आयातित दीमकों का देश को खोखला करने का आन्दोलन है परन्तु राष्ट्र को अधिक आदर्शों के प्रति समर्पित शासनतंत्र , अधिक विश्वास एवं जबाबदेही  की आवश्यकता है .

राजीव उपाध्याय

पिछले कुछ दिनों से जो राजधानी  मैं कॉकरोच जनता पार्टी के नाम पर जो तथाकथित युवाओं का आन्दोलन चल रहा है उसका नीट के पेपर लीक होने का मुख्य मुद्दा तो युवाओं  को साथ जोड़ने के लिए बहुत चालाकी  से चुना है और वह सफल भी हो गया है .इसको दोषियों को जेल भेज जल्दी समाप्त करना आवश्यक है .सब जानते हैं की कांग्रेस के काल मैं यह होता रहा है पर अभी इसे कहना मूर्खता होगी .

पर अंततः यह नेपाल , श्रीलंका और बांग्लादेश की तरह देश को विभाजित करने का कुत्सित विदेशी प्रयास है और आगे भी होगा . देश के जलते घर पर आग सकने के लिए कई  संस्थाएं व राजनितिक पार्टी भी साथ जुड़ गयीं हैं . विपक्ष जो हाशिये पर जा रहा था इस जीवन रेखा को तो नहीं छोड़ सकता था और इसलिए इसका भरपूर फायदा उठा रहा है .यह उसका अधिकार है और सरकार को राजनीती का राजनीती से ही जबाब देना होगा जैसे उसने पिछले किसान आन्दोलन को छिन्न भिन्न कर दिया था .

परन्तु देश की जनता का गुस्सा कम आंकना भी गलती होगी. अयोध्या पर छोटे से चंदे की चोरी को  इतना तूल वास्तव मैं हिन्दूवादियों की सत्ता की आपसी लड़ाई  थी और इसने  सरकार की छवि को बहुत नुक्सान पहुंचाया है . बिहार और गुजरात मैं इतने पुल टूट गए कुछ नहीं हुआ . मध्य प्रदेश का मेडिकल कॉलेज मैं दाखिले का व्यापम घोटाला  भी ऐसे ही निकल गया . उज्जैन की नव निर्मित महाकाल की मूर्तियाँ  पर पहली बारिश मैं टूट गयीं . एक से एक भ्रष्ट  राजनीतीज्ञ पुरानी पार्टी छोड़ बीजेपी मैं आकर शुद्ध हो गए . कभी गांधीजी की कांग्रेस भी देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक थी . अंततः  हर पार्टी का कोंग्रेसीकरण  ही राजनीती की नियति है .

इसका प्रतिकार सतत आदर्शवादी संस्था के मुखर होने मैं है जो सत्ता से दूर रहे पर सरकार पर नजर रखे . आर एस एस इस रोल को पहले निभाती थी अब वह भी शक्ति विहीन सी हो गयी है .

जनता को निर्बल या असहाय समझना गलती होगी . वह गलतियों का हिसाब रख रही है . शिशुपाल की तरह सौ गलती पर जनता का सुदर्शन चक्र चल जाएगा . दिल्ली , पंजाब और तमिल नाडू मैं हम यह देख चुके हैं . इसलिए इस दीमकों के आन्दोलन को  तोड़ने के बाद खुश और पीठ थपथपाने की नहीं बल्कि एक बृहत्      आत्म मंथन की आवश्यकता है .

इसके अलावा विदेशियों की विघटन कारी ताकत को कम आंकना भी मुर्खता होगी . बीजेपी को अपने आपसी झगड़े समाप्त कर और विपक्ष को साथ लेकर एक  साथ लड़ना होगा . देश के अन्दर और बाहर दोनों जगह एक साथ नहीं लड़ सकते .

देश प्रधान मंत्री से दूरदर्शिता और आदर्शवाद  की अपेक्षा कर रहा है .

 

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