Journey From An Ideal Model Minority To Resented Minority in West : भारतियों की दुखद यात्रा , कारण , निवारण और आगे क्या किया जाय
बहुत लम्बे समय से हम इस विश्वास मैं जीते थे कि अमरीका मैं भारतीय विशेषतः हिन्दू , जो आबादी का सिर्फ डेढ़ प्रतिशत है पर जिनकी प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक है ( २०२२ मैं १४५००० डॉलर प्रति वर्ष ) और आय कर का पांच से छः प्रतिशत देते हें जो लगभग २५०- ३०० बिलियन डॉलर के करीब होता है , अंग्रेजी मैं पारंगत, ७८ % उच्च शिक्षित , शांति प्रिय हें , कानून व्यवस्था को दृढ़ता से मानने वाले हें , सिर्फ अमरीका मैं ७२ नए बिलियन डॉलर कि उद्द्यमी भारतीय हें . इस लिए वह अमरीका कि सर्व प्रिय अल्पसंख्यक आबादी हें . कुछ पंजाब से अवैध वीसा या बिना वीसा लोग जाते थे कुछ पकडे जाते थे कुछ रहने लगते थे . पर उनकी संख्या बहुत नहीं थी . भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए इन देशों मैं लाखों की संख्या मैं जाते थे पर सब वैध तरीके से वीसा लेकर जाते थे .
यही बात इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पर आंशिक रूप से लागू होती थी जहाँ पर आय इंतनी अधिक नहीं है पर वहां कि गोरी आबादी के बराबर ही थी . कहीं भी भारतीय अपराध या आतंकवादी गति विधियों मैं संलग्न नहीं थे इस लिए पोलिस भी उनको विश्वास पात्र मानती थी .
राष्ट्रपति ट्रंप के आते ही मनो सब कुछ जादू की छडी से बदल गया . अमरीका , ऑस्ट्रेलिया , कनाडा और इंग्लैंड मैं एक भयंकर भारत विरोधी माहौल खडा हो गया . भारतीय छात्रों को पीटा जाने लगा और कुछ हत्याएं भी हुई . सस्ते भारतीय इंजीनियरों के नौकरी पर लेने पर रोक लगने लगी .ट्म्प ने अनेको अवैध प्रवासी भारतियों को हथकड़ी लगा कर वापिस भेजा . इन सब देशों मैं प्रवासियों को वापिस भेजने की जबरदस्त मांग उठने लगी . अमरीका और इंग्लैंड जाने वाले छात्रों और नौकरी पर की संख्या बहुत घट गयी .
ऑस्ट्रेलिया और कनाडा मैं भी भारतियों का विरोध बहुत बढ़ गया है . इसके मुख्या कारणों का विश्लेषण नीचे दिया है .
प्रश्न यह है कि हम तो आज भी सब यूरोप के देशों और रूस इजराइल इत्यादि से भारतीय लोगों को नौकरी देने की बात कर रहे हें . पर जब वहां भी भारतियों की संख्या बढ़ जायेगी और अमरीका कि तरह वह समृद्ध भी हो जायेंगे तो क्या वहां भी उनको निकलने की मांग उठने लगेगी ?
अगर जबरदस्ती से देश से निकलने की बात करें तो युगांडा के इदी अमिन का नाम सब को आज भी याद है . लाखों समृद्ध भारतीय मूल के लोगों को देश से रातों रात निकाल दिया था और उनकी सारी सम्पत्ती जब्त कर ली थी . इस अफ्रीकी करण की शुरुआत तो वहां के प्रथम राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही कर दी थी . अन्य अफ्रीका के देशों मैं भी अति समृद्धि के कारण भारतियों का विरोध है . इदी अमीन की तरह लीबिया के गदाफी ने २०००० इटालियन लोगों को देश निकला दे दिया था . कश्मीर से पंडितों कि कहानी तो सर्व विदित है .
इदी अमीन के बाद अफ्रीका मैं भारतीयों ने सुरक्षा के लिए अपना घर और व्यापार बैंक को गिरवी रख पैसा लन्दन मैं रखना शुरू कर दिया था . अब अमरीका प्रतिबंधों के नाम पर कभी रूस , कभी ईरान और कभी अफ़ग़ानिस्तान का पैसा जब्त कर लेता है . यही क्या कभी भारतियों के साथ नहीं हो सकता ?
भारत सरकार डॉलर अकाउंट नहीं खोल सकती .परन्तु डॉलर / येंन / यूरो के NRI Bonds प्रवासी भारतियों को बेच सकती है . इसीतरह घर , शेयर इत्यादि मैं प्रवासी भारतियों का पैसा लगा सकती है जो अवधि पूरी हो जाने पर जब चाहें विदेशी मुद्रा मैं बिना टैक्स बदल सकते हें . इसकी प्रति व्यक्ति सीमा दस करोड़ रूपये की हो सकती है . यह उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक है .
इसी तरह प्रवासी भारतियों को अन्य सुविधा देना हमारा दायित्व है जो सरकार को पूरा करना चाहिए .




