अयोध्या और श्रद्धा की भ्रूण ह्त्या ; बाबूराज अयोध्या को सिर्फ एक सैर सपाटे की जगह बना देगा तिरुपति या वैष्णो देवी की तरह आस्था का केंद्र नहीं .
पांच सौ साल की लम्बी प्रतीक्षा व बलिदान के बाद बने अयोध्या के नवनिर्मित मंदिर से चंदे व चढ़ावे की चोरी अति निंदनीय है . परन्तु यह कोई अभूतपूर्व व विलक्षण घटना नहीं है .देश मैं जमीन की खरीद फरोख्नत और नए निर्माण कार्य भ्रष्टाचार के सैकड़ों साल से शाश्वत गढ़ हैं , हर राज्य व् हर सरकार के कार्यकाल मैं . कोई सामान्य निर्माण संस्था या सरकार इसका अपवाद नहीं है.
परन्तु जनता की अपेक्षा थी कि क्योंकि राम व अयोध्या हिन्दू समाज की आस्था के केंद्र बिंदु हैं इसलिए अयोध्या का नव निर्मित मंदिर भगवन राम के त्याग व आदर्शों का प्रतिबिम्ब होंगे.
इस आशा के धुल धूसरित होने के बहुत दूरगामी कुप्रभाव होंगे .
इतने प्रचार व दर्शनार्थियों की सतत भीड़ के बावजूद अयोध्या मंदिर की हुंडी मैं दिया हुआ सामान्य जनता का दान मात्र अस्सी करोड़ रूपये वार्षिक ही है ( या परोक्ष रूप से दिखाया गया है ) मंदिर निर्माण के दान अलग है . इसके विपरीत तिरुपति की हुंडी मैं वार्षिक दान १७०० करोड़ और वैष्णो देवी के मंदिर का दान ५०० करोड़ है. शिर्डी के साईं मंदिर का वार्षिक दान भी ५०० करोड़ हो जाता है .
जनता के यह दान मान्यता व् श्रद्धा से उपजते हैं . बांके बिहारी का मंदिर कृष्ण जन्म भूमि के मंदिर से अधिक श्रद्धालुओं का केंद्र है . श्रद्धा अक्सर किव्दंतियों और मनोकामना पूरी होने की गाथाओं से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है. वैष्णो देवी की भीड़ का उत्साह अनायास ही सबको रोमांचित कर देता है .
लम्बे इतिहास के बावजूद वर्तमान राम मंदिर तो अभी नया है .इसे लम्बी श्रद्धा के केंद्र के रूप मैं उभरना बाक़ी है . राजनीती की मह्त्वाकांक्षा और कर्मचारियों का लालच इसमें विष घोलेगा . मंदिर कोई कम्पनी नहीं है . इसमें CEO का क्या काम है . मंदिर को सच्चे संतों और श्रद्धालू लोगों की आवश्यकता होती है . जन्मजात महत्वाकांक्षी बाबु कभी श्रद्धा उपजा सकता है ? उसका अतीत ही श्रद्धा को बाहर ही रोक देगा . मंदिर के दोहन मैं एक मात्र एक उपयोगी कड़ी ही बन सकता है . इससे अयोध्या एक सैर सपाटे का केंद्र बन जायेगी .लोग मंहगे होटलों मैं ठहर कर सौ या हज़ार रूपये दान कर हवाई जहाज या वन्दे भारत से वापिस चले जायेंगे .सात दिन तक वैष्णो देवी के दर्शन के लिए प्रतीक्षा करते श्रद्धालू कहीं नहीं दीखेंगे .
इस चंदा चोरी को पकड़ कर बिना शोर शराबे के दोषियों को एक महीने मैं दण्डित कर जनता को बताया जा सकता था . इससे श्रद्धा बची रहती . किसी महत्वाकांक्षी नेता की किसी बाबु को CEO बनाने के लिए इसका अत्यंत दुष्प्रचार एक कुत्सित व्यूह रचना थी . अपने समय के घोर पापों के बोझ तले दबे विपक्ष का इसको लेकर घडीयालू आंसू बहाना भी उसी का दूसरा रूप है. दोनों इस पाप के समान दोषी हैं .
हिन्दू समाज को आगे आकर पुनः राममन्दिर की अब नेताओं और बाबुओं से रक्षा करनी होगी .
राम मंदिर को आस्था और श्रद्धा का केंद्र ही रहने दें.

