छोड़ दो आँचल … परिधान की शालीनता 

छोड़ दो आँचल … परिधान की शालीनता

हेमंत कुमार

छोड़ दो आँचल …

 ब्लॉग की इस कड़ी का शीर्षक भी हिंदी चलचित्र के एक गीत के मुखड़े से लिया है, लेकिन वह चलचित्रों से कदापि संबद्ध नहीं है। आज हम विवेचना करेंगे आँचल की, या फिर परिधान की, और आजकल मानी जाने वाली ‘आधुनिक’ सोच की।

हमारे परिधान, चाहे वह स्त्री के हों या पुरुष के, हमारी सोच से प्रभावित होते हैं। या यूँ कह सकते हैं कि हमारी सोच हमको अनेक आयामों में प्रभावित करती है, और परिधान उसमें से केवल एक छोटा सा अंग है।

पहले बात करते है आँचल की। मैं आधुनिक परिधानों के विरुद्ध नहीं हूँ लेकिन यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि नारी का सबसे अच्छा परिधान साड़ी है – उसमें गरिमा है, शालीनता है, सौंदर्य है, आकर्षण है, और सबसे बड़ी बात यह कि उम्र के हर पड़ाव पर वह खिलती है, शरीर चाहे जितना बदल जाए। जहाँ वह शरीर-सौष्ठव को निखारती है, वहीं वह कुछ कमियों पर आवरण भी डाल देती है। उसका एक आवश्यक पहलू है आँचल। यह आँचल एक बहू के सिर पर पल्ले के रूप में बड़ों के लिए आदर को दर्शाता है, अपने बच्चों को छिपने के लिए एक ओट, उनका पसीना पोंछने के लिए तौलिया, हवा करने के लिए पंखा, लहराता आँचल प्रेमी या पति को रिझाने के लिए, और वहीं कमर कस के बाँधने पर रानी लक्ष्मीबाई सम वीरांगना का रूप भी दिखाता है। अब आप ही बताएँ, क्या है किसी परिधान में ऐसी क्षमता?

कुछ दशक पहले टीवी पर (उस समय ओटीटी नहीं होते थे) एक चलन आरंभ हुआ था फिल्मी गानों के ऊपर लोग अपनी सोच के अनुसार नाचते थे जिसे रीमिक्स कहते थे। यह चलन आज भी है, लेकिन उस समय नया-नया था, और उसमें उपरोक्त शीर्षक वाले गाने पर कुछ लड़के-लड़कियाँ नाच रहे थे। अंतर यह था कि लड़कियाँ हॉट-पैंट औऱ एक छोटा सा टॉप पहने थीं। अब ऐसे कपड़े पहन कर आप गा रहे हो कि ‘छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा…’ तो अटपटा तो लगेगा ही। जब आँचल ही नहीं है तो कोई क्या पकड़ेगा और क्या छोड़ेगा?

परिधान वही पहनने चाहिए जो आप पर अच्छा लगे और अवसर के अनुरूप हो। कोई महिला यदि किसी कारखाने में काम करती है तो साड़ी जैसा कपड़ा, जो किसी मशीन में फँस सकता हो, पहनना असुरक्षित हो सकता है। जहाँ बहुत सीढ़ी चढ़नी-उतरनी हो तो साड़ी बाधा पहुँचाएगी। वहाँ आधुनिक परिधान पहनना उचित है। अब तरणताल में साड़ी पहन कर तैरना असुविधाजनक हो सकता है। सभी पाश्चात्य परिधान अपनी जगह ठीक हैं यदि आपका शरीर उसे निभा सके। बदन-उंघाड़ू कपड़े सब पर नहीं रुचते। न केवल बदन-उंघाड़ू, वरन कई और ऐसे कपड़े भी हैं जो सब पर उपयुक्त नहीं लगते और उसमें कुछ लोग हास्यास्पद भी प्रतीत होते हैं।

कई प्रांतों के पारंपरिक परिधान बहुत सुरुचिपूर्ण और मोहक लगते हैं और उन्हें पहनने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, फिर चाहे वह नागालैंड के हों, लद्दाख के, कश्मीर के, राजस्थान के, पंजाब के, या फिर किसी और प्रांत के विशिष्ठ पहनावे। कुछ लोगों पर पाश्चात्य परिधान भी फबते हैं।

आप सोचते होंगे कि मै केवल महिलाओं के परिधानों के बारे में बात कर रहा हूँ। ऐसा नहीं है। पुरुषों के परिधान होते ही कितने तरह के हैं? ले-दे कर पैंट-कमीज़, कुर्ता-पाजामा ही रहता है क्योंकि धोती-कुर्ता तो अब बिरला ही दिखता है। दक्षिण भारत में लुंगी-कमीज़ का चलन है, तो पंजाब में सलवार-कमीज़ का। एक टीवी शो में एक नायक अपने पिता के साथ आया था। उसने बताया कि उसके पिता घर में प्रायः लुंगी पहन के बैठते थे और ऊपर बनियाइन भी नहीं पहनते थे। ऐसे में यदि कोई मिलने आ जाता था तो ऊपर बनियाइन पहन लेते थे। स्पष्ट है कि आगंतुक असहज महसूस करता होगा। मैं इस व्यवहार का समर्थन नहीं करता।

जींस तो लिंग-भेद से परे हैं। जींस से याद आया कि एक चलन जो मेरी कभी भी समझ में नहीं आता कि लोग नयी जींस घिस कर, फाड़ कर क्यों पहनते हैं। मैं संभवतः पुराने विचारों का हूँ लेकिन मैं तो फटे कपड़ों को ग़रीब, भीख मांगने वालों से, या रंगाई-पुताई करने वालों या राज-मिस्त्री से  (जब वह काम कर रहे हों) जोड़ कर देखता हूँ। नयी, दो – तीन हज़ार रुपए की जींस में छेद करना या फाड़ना कहाँ तक उचित है? ग़रीब लोग तो कपड़े फट जाने पर फिर भी पैबंद लगा लेते हैं (एक दौर ऐसा भी था जब पैबंद भी फ़ैशन में थे)।

कपड़े चाहे जिस प्रकार के हों, उनका रखरखाव भी सही होना चाहिए। यह नहीं होना चाहिए कि वह सलवट पड़े हों और लगे कि उन्हें हँड़िया में से निकाल कर पहना गया है। इस विषय में अघिकतर पुरुष दोषी पाए जाते हैं। कुछ अपवाद भी होते हैं। मेरे पूज्य पिताजी को सदा ही स्वच्छ, इस्तरी किए कपड़े पहनना अच्छा लगता था। यदि उन्हें सोने के समय पहनने के लिए कुर्ता-पाजामा भी चाहिए होता था तो धुले कपड़े को वह स्वयं प्रेस करते थे चाहे उसके बाद उसे पहन कर उन्हें सोना ही क्यों न हो। वहीं मेरे एक परिचित की टाई इस प्रकार की होती थी कि एक अन्य परिचित ने उनके विषय में कहा कि ऐसा लगता है कि किसी बछड़े ने पगहिया (उसके गले में बाँधी जाने वाली रस्सी) को चबा-चबा कर तोड़ दिया है और गले में बँधे हिस्से सहित आ गया है।

मैंने लेख के आरंभ में लिखा था कि यह केवल परिधान तक ही सीमित नहीं है बल्कि तथाकथित ‘आधुनिक’ सोच के बारे में भी है।

पुरुष और महिलाएं शारीरिक संरचना से ही नहीं, भावनात्मक परिपक्वता और सहजज्ञान में भी भिन्न हैं। प्रायः पुरुषों के सापेक्ष महिलाएँ अधिक व्यावहारिक होती हैं और भावनात्मक रूप से अधिक परिपक्व होती हैं। अपवाद दोनों-तरफ़ हो सकते हैं। ऐसे में महिलाओं को पुरुषों से बराबर नहीं, श्रेष्ठ मानना ही उचित होगा। इस विषय में मैंने एक और कड़ी में पहले भी उल्लेख किया था जिसका शीर्षक था ‘उत्तम लिंग’। जो पाठक उसे पढ़ना चाहें तो लिंक साथ में दिया है।

https://dhaakar.blogspot.com/2021/04/blog-post.html

आजकल देखा जा रहा है कि बराबरी करने के फेर में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो मेरे विचार से उचित नहीं है।

घर का काम साझा करना ठीक है लेकिन उसे माप तौल कर आधा आधा करना संभवतः अति है। बच्चे की नैपी एक दिन मैं बदलूँगी दूसरे दिन तुम बदलोगे। खाना एक दिन मैंने बनाया है तो दूसरे दिन तुम बनाओगे। आदि आदि। ग़नीमत है कि यह नहीं कहा कि आधा बच्चा मैंने जना है, बाक़ी आधा तुम जनो। अरे भाई, बच्चों का माँ के साथ जो संबंध होता है वह पिता के साथ नहीं होता। और इसका उलटा भी उतना ही सच है। इसका यह अर्थ भी नहीं कि बच्चे के सारे काम माँ के हवाले। पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं, पर्याय अथवा विकल्प नहीं।

एक चुटकुला याद आया।

एक नये-नये माँ-बाप अपने शिशु के साथ घर पहुँचे। दो दिन बाद की पत्नी ने कहा – ‘मुझे बच्चे में कुछ अंतर लग रहा है… लगता है हमारा बच्चा नहीं है।’ पति ने मासूमियत के साथ उत्तर दिया – ‘तुम्हें याद है कि जब हम बच्चा ले कर अस्पताल से निकले ही थे कि उसने नैपी गंदी कर दी थी… उस समय तुमने मुझसे कहा था कि इसे अंदर ले जा कर बदल लाओ? तो मैं उसे अंदर से एक दूसरे साफ़ बच्चे से बदल लाया था।’

सब कुछ आधा आधा करने की बात घर के खर्च पर लागू होती है या नहीं, यह भिन्न युगलों में भिन्न हो सकती है। संभवतः कुछ ऐसा करते हों तो कुछ ऐसी महिलाएँ भी होंगी जो इस विषय में मानतीं हैं कि घर का खर्च तो पति को ही उठाना चाहिए। (बहुत से क़ानून भी कुछ ऐसा ही मानते हैं। रेलवे में अविवाहित पुत्री को और विधवा माँ को पास-नियमों के अधीन रेलकर्मी का आश्रित मानते हैं, जबकि पुत्र को अट्ठारह वर्ष के बाद ही आश्रितों की सूची से बाहर कर देते हैं यदि वह पढ़ाई न कर रहा हो, अन्यथा पच्चीस वर्ष तक आश्रित मान लेते हैं। पिता के जीवित रहते माता रेलकर्मी पर आश्रित नहीं मानी जाती। तलाक़ के अवसर पर भी पुरुष की आय और जायदाद को देखते हैं, दोनों की नहीं।)

रहा घर का काम, तो वह तो घर का होता है, न कि पत्नी या पति का। उसे अपनी अपनी सुविधा और क्षमताओं अनुसार करना चाहिए। कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या मैं घर के काम में पत्नी का हाथ बँटाता हूँ। मैंने उसके प्रश्न पर ही एक प्रश्न लगा दिया क्योंकि उसके पूछने में यह बात निहित थी कि घर का काम पत्नी का होता है। मैंने उसे कहा कि घर का काम दोनों मिल कर करते हैं और एक दूसरे का हाथ बँटाते हैं।

आधुनिकता का एक आयाम यह भी है कि महिलाएँ भी मद्यपान व धूम्रपान करने लगी हैं। मैं यह नहीं कहता कि यह दोनों व्यसन पुरुषों के लिए सही हैं, लेकिन महिलाओं में भी इन्हें देखना दुखद है। बल्कि मैंने पुरुषों में धूम्रपान के शौक़ में कमी देखी है।

आधुनिकता के चलते लोग देर से विवाह करते हैं और फिर अपना करियर बढ़ाने के चक्कर में संतानोत्पत्ति के विषय में अनिच्छा व्यक्त करते हैं। अंग्रेज़ी में इसके लिए एक शब्द प्रयुक्त होता है DINK या डबल इनकम नो किड्स।

सृष्टि को आगे चलाने के लिये संतान का होना अनिवार्य है। भारतीय समाज में परिवार का बहुत महत्व है और रिश्तों का भी। पश्चिमी देशों में बालिग़ हो जाने के बाद बच्चे प्रायः अपनी  ज़िंदगी अलग जीने लगते हैं। मेरा मानना है कि परिवार का संबल एक महत्वपूर्ण बात है जो न केवल बचपन में, बल्कि जवानी में भी और बुढ़ापे में तो और भी अधिक आवश्यक होता है

मैं यह नहीं कहता कि पाश्चात्य समाज बुरा है। वह बस भिन्न है। हमारी मान्यताओं, संस्कारों, आकांक्षाओं, और संस्कृति से भिन्न। बिना सोचे समझे उसका अंधानुकरण ठीक नहीं है फिर चाहे वह सोच का हो, फ़ैशन का हो, या पहनावे का।

ब्लॉग के अंत में एक कुण्डलिया हो जाए?

            कपड़े  ऐसे  पहनिए, जो  अवसर  को  भाय,
मर्यादा  तन  की  रखे,  और  बजट  में आय।
            और  बजट  में आय,  किंतु  दूजों  की  देखी,
            बेढंगे,   बेतुके,   वस्त्र    में   बढ़े   न   शेखी।
            कह ‘धाकड़’ कविराय, छोड़ फ़ैशन के झगड़े,
            रहें  सुशोभित  सदा, पहन  कर  ऐसे कपड़े।।
                                     x-x-x
                            नर-नारी  को  जोड़ कर,  रचिए  यहाँ  गृहस्थ,
                            उन्हें  अकेला  छोड़  कर, रहिए  सदा  तटस्थ।
                            रहिए  सदा  तटस्थ, खोज  वह  अपनी सीमा,
                            साथ  चलें  वह, वेग  तीव्र  हो या  हो  धीमा।
                            कह ‘धाकड़’ कविराय, कि पूरक, नहीं बराबर,
                            अपना-अपना  धर्म  निभाएँ,  नारी  औ’  नर।।

धाकड़

 

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