Reconstructing The World From Debris After Trump : रेगन या क्लिंटन जैसे सौम्य और चतुर नेताओं को भी अमरीका को अपना खोया हुआ प्रभाव दिलाने मैं तीन साल शांति के चाहिए होंगे फिर भी पुरानी साख पूर्ण रूप से नहीं आयेगी . रूस और  चीन पूरी कीमत वसूलेंगे . भारत कहाँ होगा ?

Reconstructing The World From Debris After Trump : रेगन या क्लिंटन जैसे सौम्य और चतुर नेताओं को भी अमरीका को अपना खोया हुआ प्रभाव दिलाने मैं तीन साल शांति के चाहिए होंगे फिर भी पुरानी साख पूर्ण रूप से नहीं आयेगी . रूस और  चीन पूरी कीमत वसूलेंगे . भारत कहाँ होगा ?

राजीव उपाध्याय

अमरीका आज इरान पर हमला कर पछता रहा होगा . ईरान ने उसकी सारी वर्षों से इकट्ठी शक्तिशाली सेनाओं को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया . उसके विशाल एयर क्राफ्ट करियर मिसाईल हमलों से बचने के लिए पीछे हट गए . जिन अरबों ने उसे वर्षों अकूत पैसा दिया उनको भी नहीं बचा पाया . न ही ईरान के परमाणु युद्ध की क्षमता को खतम कर पाया . नाटो के सरे देशों ने बीच मैं पड़ने से मना कर दिया . रूस का तेल धडल्ले से बिक रहा है . अब ईरान को भी तेल बेचने की सुविधा देनी होगी . चीन ताइवान पर कब्ज़ा करने कि सोच रहा है और शायद कर भी ले . युक्रेन का पता नहीं पर वह भी लड़ रहा है .

सब तरफ अमरीकी असफलताओं खंडहर बिखरे हुए हें और वह अकेला अपनी उजड़ी हुई दुनिया मैं खड़ा है .

अब यह युद्ध परमाणु हमले के बिना समाप्त  नहीं होगा .अमरीकी संसद परमाणु हमला करने नहीं देगी . इजराइल करेगा तो छुपे ईरानी बम भी आ सकते हें . अगर हुती मैदान मैं कूद पड़े तो वैश्विक अर्थ वयय्वस्था और धराशाही  हो जायेगी

इस युद्ध से क्या और तबाही होगी कोई नहीं जानता परन्तु उससे भी विषम प्रश्न है कि ट्रम्प के बाद दुनिया को पटरी पर कौन लायेगा और कैसे लायेगा ?

यह युरोप के बस की बात नहीं है क्योंकि तेल और गैस कि मार उसे तो बहुत नुक्सान पहुंचाएगी. उसने अपनी रक्षा को वर्षों से अमरीकी आश्वासनों पर रखा और वह अब बेकार हें . रूस अगर युक्रेन से जीत गया तो शायद यूरोप को बचाने को मान जाय अगर उसकी पुरानी पाइप लाइन चालू हो जाएँ और उस पर लगे सब प्रतिबन्ध हट जाएँ . इसी तरह तबाह इरान के सब प्रतिबन्ध हटाने होंगे . इराक की तरह अगले बीस साल तक अमरीका उसका तेल मुफ्त मैं लेना चाहेगा जो शायद संभव न हो .

चीन ने अगर ताइवान पर कब्ज़ा कर भी लिया तो भी उसकी साख बढ़ेगी नहीं . जापान कोरिया और भारत और आसियान भी अब उसके विरुद्ध हो जायेंगे .

ऐसे मैं अगर अमरीका मैं क्लिंटन या रेगन जैसे राष्ट्रपति आ जाये तो वह पुनः सब संभाल सकता है . चीन के पैसे से नयी मार्शल प्लान से ईरान व मध्य एशिया को  खड़ा किया जा सकता है . पर इससे चीन का पूरे तेल पर प्रभुत्व बढेगा . रूस  के तेल व गैस से यूरोप कि अर्थ व्यवस्था धीरे धीरे पटरी पर आ जायेंगी पर मंदी बहुत दिन चलेगी . भारत का रुपया और निर्यात भी मंदी कि चपेट मैं आ सकता है . हो सकता है दुबई की मदद भारत कर दे अपना प्रभाव बचने के लिए , पर इन सबसे भी वह शायद ४-५ % की विकास दर बचा लेगा . जापान , ऑस्ट्रेलिया , कनाडा भी बचे रहेंगे पर अमरीकी मंदी सबको प्रभावित करेगी .

कनाडा के प्रधान मंत्री मार्क कारने बहुत बुद्धिमान हें  और उनकी भी प्रभाव शाली भूमिका हो सकती है.

पर विश्व को सबसे अधिक बुद्धिमान अमरीका की आवश्यकता होगी लालची अमरीका की नहीं .नए राष्ट्रपति को ट्रम्प की नीतियों से पूरी तरह पल्ला झाड लेना होगा .

पर क्या ट्रम्प के बाद फिर कोई सिर फिरा दुबारा नहीं सत्ता मैं आ जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है , अगले अमरीकी चुनाव तक पूरा विश्व अभी अनिश्चितता के दौर मैं रह सकता है .

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