क्या घायल पर स्वाभिमानी ईरान ही अंततः फिर विजेता हुआ : भारत के लिए भी सीख : स्वाभिमान व स्वतंत्रता की कीमत होती है मुफ्त नहीं मिलती
रूस के युक्रेन के हमले की तरह ही इस बार अमरीका धोखा खा गया . उसने ईरान पर ३९ दिन पहले २८ फरवरी को पहले चढ़ाई कर दी , शायद इस धोखे मैं कि वह शायद एक सप्ताह मैं जीत जाएगा . शुरू मैं ही ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनी की ह्त्या कर दी गयी . अमरीका व इजराइल को आशा थी कि खामेनी व शीर्ष नेत्रित्व को हटाते ही लड़ाई खतम हो जायेगी जैसा सद्दाम व गद्दाफी साथ हुआ था . पर ईरान मैं ऐसा नहीं हुआ . ईरान की सरकार व जनता दोनों ने भरपूर ताकत से जबाब दिया और डट के मुकाबला किया . वह इस युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार थे .
पहले उस के हज़ारों सस्ते ड्रोन आये और इसराईली व अमरीका के बहुत मंहगे रक्षात्मक इंटरसेप्मटर मिसाईलों को दीरे धीरे खर्च करवा दिया . फिर छोटी दूरी के मिसईलों से क़तर , दुबई , बहरीन और सऊदी अरेबिया के अमरीकी सैन्य अड्डों पर भीषण हमले लिए . इजराइल के आयरन डोम व एरो मिसाइलों की रक्षात्मक पंक्ती को छिन्न भिन्न कर तेल अवीव , हाईफा पर भी खूब मिसाईल हमले किये . अमरीकी उनके नेताओं को मारते गए पर इरानी इस के लिए तैयार थे और इसका युद्ध पर कोई प्रभाव एक नेता के मरते ही दुसरे ने जगह ले ली .
जैसे ही अमरीका ने तेल संयत्रों पर हमला किया ईरान ने लम्बी दूरी की मिसाईलों से उसके एयरक्राफ्ट करियर अब्राहम लिंकन पर हमला कर दिया . अमरीका को सारे युद्ध पोत दूर ले जाने पड़े . इरान के मिसाइल घुमते हुए हमला करते थे और अमरीकी और इस्राईल के मिसाईल उनको बिलकुल नहीं रोक पा रहे थे . अमरीका ने भीषण बमबारी की पर ईरान ने भी उसके मध्य एशिया मैं उसके सब सैन्य अड्डों कू तहस नहस कर दिया .
अमरीका ने उसके परमाणु संयत्रों को ध्वस्त करने के लिए बंकर बर्स्तर बमों को डाला पर इरान ने पहाड़ों मैं बहुत गहराई मैं यूरेनियम छुपा रखा था . चालीस दिन मैं भी अमरीका कुछ नहीं ख़त्म कर पाया . इस्राईल की तो हालत बहुत खराब थी . उस ने बहुत मिसाईल रोके पर तब भी अनेकों मिसाइलों ने बहुत नुक्सान पहुंचाया . दोनों ने एक दुसरे की रेफिनरियों को भी काफी नुक्सान पहुंचाया .
अंततः राष्ट्रपति ट्रम्प को अपनी दयनीय स्थिति समझ आ गयी ,
वह इरान को नहीं तोड़ पाए . उसके परमाणु कार्यक्रम को भी नहीं रोक पाए . कोई देश उनके साथ नहीं है . नाटो ने युद्ध मैं भाग लेने से मना कर दिया . अमरीकी सेना मैं भी इसका बहुत विरोध था . मंहगे तेल व गैस के कारण विश्व की जर्जर अर्थ व्यवस्था और चरमारा गयी . ईरान ने होरमुज़ से जहाज़ों का आवा जाही पूरी तरह रोक दी . अब वह उस पर टोल लगाना चाह रहा है जिससे युद्ध के नुक्सान की भरपाई हो सके . अगर इसे मान लिया कल तुर्र्की , मलेसिया , यमन भी अपने जलमार्गों पर टोल लगा देगे .
तो जिसको तिनका समझ रहे थे उस ईरान ने अमरीका को रुला दिया . अब उसके एक छत्र विश्व नेत्रित्व के दिन लद गए .चीन और साहसी हो जाएगा और ताइवान को हड़प कर लेगा . अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सब की लुटिया डुबो दी .
बहुत चोट खा कर और बलिदान देकर भी इरान ने अपने स्वाभिमान व स्वंत्रता की रक्षा कर ली .
इस्राईल का भविष्य भी अब उज्जवल नहीं है . इरान उसकी जिन्दगी मुश्किल करता रहेगा . अब अरब देशों का दुस्साहस और बढ़ जाएगा .
भारत के लिए इस युद्ध ने फिर दिखा दिया है कि स्वाभिमान और स्वत्न्र्ता के लिए कीमत अदा करनी पड़ती है . युरोप व भारत दोनों ने अपनी रक्षा को कभी उतना महत्व नहीं दिया जितना जरूरी थी . हमारी बाबूओं ने तो देश की रक्षा व्यवस्था को पूर्णतः जकड कर कुंठित कर रखा है . हम तब जागते हें जब पाकिस्तान किसी नई तकनीक लेकर हमसे आगे निकल जाता है . इस आग लगने के बाद कुआँ खोदने की आदत ने हम को एक सुस्त हाथी बना दिया है जिसे कोई भी भेडीयों का गुट अपनी मर्जी से काट लेता है . समय पर उच्च रक्षा सामग्री नहीं खरीदने से कभी कोई अभिनन्दन पकड़ा जाता है या रफल गिरा दिया जाता है . हम हर राज्या चुनाव के लिए नयी मुफ्त स्कीम शुरू कर देते हें और आवश्यक रक्षा उपकरण की खरीद टाल दी जाती है.
एक हवाई जहाज़ अपहरण हो जाता है और उसके परिजनों के आन्दोलन से सारी सरकार डोल जाती है . हम क्या चोट झेलेंगे ! ईरान से हमें इसी का प्रतिकार सीखना चाहिए . दृढ निश्चय व पूर्ण तैयारी, साहस और चोट झेलने व बलिदान की क्षमता के बिना युद्ध नहीं जीते जा सकते . इतिहास गवाह है कि हमारे सैनिकों ने नहीं बल्कि नेतृत्व ने ही हमें सदा हरवाया है .
अब फिर किसी भी हार के आगे फिर गुलामी खडी है जिसके हम इतने अभ्यस्त हें
भारत को इरान , युक्रेन व विएतनाम से बहुत कुछ सीखना है और जितना जल्दी सीख लें अच्छा होगा .

