The New Neutral India Is Right : दोनों मित्र हें पर जिन्होंने  हमारे किसी युद्ध मैं हमारा साथ नहीं दिया उनके लिए हम युद्ध का  खतरा क्यों मोल लें , हाँ शांति कि कामना और प्रयास अवश्य करेंगे और मानवीय सहायता अवश्य देंगे !

The New Neutral India Is Right : दोनों मित्र हें पर जिन्होंने  हमारे किसी युद्ध मैं हमारा साथ नहीं दिया उनके लिए हम युद्ध का  खतरा क्यों मोल लें , हाँ शांति कि कामना और प्रयास अवश्य करेंगे और मानवीय सहायता अवश्य देंगे !

राजीव उपाध्याय

देश मैं भौकाल आया हुआ है कि हमारे सदियों से मित्र देश ,इरान के निर्दोष राष्ट्र प्रमुख आयोतुल्लाह खामेनी की ह्त्या  पर हमें अमरीका व इजराइल की भर्त्सना  करनी चाहिए थी . किसी देश पर अकारण सैन्य हमला अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है जिसकी भारत को निंदा करनी चाहिए और ईरान कि मदद करनी चाहिए . यहाँ तक की पूर्व रक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन तक ने हमारी चुप्पी को गलत करार कर दिया .

यह सत्य है कि इसमें अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन अवश्य हुआ है . पर जब अमरीका ने मादुरो पर , सद्दाम पर , गद्दाफी पर और अनेकों राष्ट्रों पर हमला किया तो कौन रोकने आया . इन सब मैं भारत तो परिवार की बूढ़ी दादी की तरह है जिसकी बात सुनते सब हें पर मानता कोई नहीं . अगर वह झगड़ बैठे तो उसकी रोटी भी बाद हो जायेगी.

भारत ने अब तक बिलकुल ठीक नीति अपनाई है . हम युद्ध को रोक नहीं सकते . दोनों मित्र हें . इसलिए चुप रहो और यदा कदा  शांति के लिए प्रेरित करते रहो .

फिर इरान विशेषतः खामेनी हमारे कभी मित्र नहीं थे . कश्मीर पर सदा उन्होंने पाकिस्तान का साथ दिया . आर्टिकल ३७० हटने के विरुद्ध कश्मीरियों को उठ खड़े होने को कहा . ईरान के शाह ने १९६५ की लड़ाई मैं पाकिस्तान को जेट खरीदने के पैसे दिए और अपने हवाई जहाज भी दिए. 1971 कि बांग्लादेश कि आज़ादी के समय शाह ने पाकिस्तान का समर्थन किया था . १९६२ के युद्ध मैं भी ईरान ने कोई सहायता नहीं की थी .

नादिरशाह और अहमदशाह दुर्रानी को भूल भी जाएँ तो भी कुद्रेमुख पर इरान अपने वायदे से मुकर गया था . इसी तरह भारत द्वारा खोजे गए फरजान गैस फील्ड को आज तक भारत को नहीं दिया . हमारे व्यापारियों का चावल इत्यादि का पैसा देने मैं बहुत देरी करता है .

पिछले कई सालों से भारत और ईरान के हित मिल गए हें . चाभार बंदरगाह मैं भारत ईरान मैं बड़ा निवेश कर रहा है और भारत को भी फायदा है . भारत रूस के व्यापारिक गलियारे / रास्ते से दोनों को फायदा होगा . अफ़ग़ानिस्तान मैं अशरफ घनी की सरकार को दोनों समर्थन दे रहे थे . इस तरह जहाँ दोनों का फायदा होता है वहां वह मिल जाते हें पर अपना घाटा कोई नहीं कराता है.

इसके विपरीत इजराइल ने सदा हमारी बहुत मदद की है . १९७१ मैं भी , कारगिल की लड़ाई मैं भी और ऑपरेशन सिन्दूर मैं भी . हम आज भी इजराइल पर रक्षा तकनीक के लिए आश्रित हें . ऐसे मैं इजराइल को दुश्मन नहीं बना सकते .

इसलिए  भारत सरकार बिलकुल  ठीक कर रही है . हम युद्ध रुकवा नहीं सकते . न इजराइल न अमरीका को अपना दुश्मन बना सकते . तो फिर सिर्फ खाना भेजो , दवाएं भेजो और बाकी मानवीय सहायता देते रहो . दोनों को शांति के लिए प्रेरित करते रहो .

यही हम कर सकते हें और कर रहे हें . हमारी नीतियाँ हमारे हितों को साध रही हें जो ठीक है .

 

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