विदेशी भारतीय : सम्मानित , शांति प्रिय , पढ़ाकू से अपमानित व हमलों तक का सफ़र : क्यों और कैसे हुआ ? सैलानी भी नहीं चाहते : सरकार का नया दायित्व
सिर्फ एक दशक पहले तक हम विदेशों मैं भारतीयों की सफलता की गाथाएँ सुनते थे . इंग्लैंड मैं हम लगभग अपराध मुक्त , उच्च शिक्षा के लिए प्रयास रत मेहनती माने जाते थे हालाँकि बी बी सी अधिकांशतः भारत की बुराई ही करता था . अमरीका मैं तो कंप्यूटर युग के बाद भारतीयों का बोलबाला हो गया था . यहाँ तक कहा जाने लगा की केवल दो प्रतिशत भारतीय औरों से तीन गुना टैक्स देते हैं . यूनिवर्सिटी और अस्पताल भारतीय प्रोफेसरों और डोक्टरों से भरे थे . गल्फ मैं पहले भारतीय मजदूर ही जाते थे पर अब वहां भी भारतीयों का शिक्षित वर्ग उच्च नौकरियों मैं बड़ी संख्या मैं है .यूरोप , जापान और रूस मैं भी मेहनती भारतीय बड़ी संख्या मैं जा रहे हैं .
पर अब यह कहानी पुरानी हो चुकी है . अब लगभग सब जी – ७ देशों मैं भारतीयों का विरोध हो रहा है . ऑस्ट्रेलिया और दुबई जैसे मित्र देश मैं भी भारतियों पर हमले बढ़ रहे हैं . भारतीय छात्र जो ऊंची फीस देते हैं या भारतीय सैलानी तक को भी अब और नहीं चाहते . सबसे अधिक दुखदायी है कि अब अनेक देशों मैं भारतियों पर हमले बढ़ रहे हैं और अब भारतीयों मैं डर फ़ैल रहा है.
दूसरी ओर हमारे यहाँ नौकरियों की बहुत कमी है . बाहर जाना एक मजबूरी है. औद्योगिक विकास कम है आबादी ज्यादा है . इसके अलावा भारत का निर्यात कम है . विदेशी मुद्रा के लिए हम भारतियों द्वारा भेजे गई विदेशी मुद्रा पर आश्रित हैं .
भारतियों की इस बदलती स्थिति के लिए कुछ तो पश्चिम की आर्थिक समस्याएं जिम्मेवार हैं और कुछ अब बहुत अधिक भारतियों का विदेशों मैं बसना भी है . फिर कुछ हमारी आदतें जैसे सार्वजानिक स्थानों पर गंदगी , जोर जोर से बोलना , मुंह से दुर्गन्ध इत्यादि भी हैं जो लोगों को पसंद नहीं आतीं . पश्चिम जगत सार्वजानिक लोक व्यवहार मैं हमसे आगे है . भारतियों की अनेक भाषा , संस्कृति , त्यौहार का सार्वजानिक मनाना भी अब खलने लगा है.
ऐसे मैं भारत सरकार का दायित्व बढ़ गया है . विदेशों मैं जाने वालों को एक कोर्स देना आवश्यक है . भारत की विविधता को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं है . स्वन्त्न्रता दिवस , गणतंत्र दिवस व् दिवाली के अलावा बाकि त्यौहार घरों या क्लब मैं मनाना उचित होगा . भाषा ,धर्म , राज्य के उत्सवों मैं बड़े विदेशियों को नहीं बुलाना चाहिये . ह्यूस्टन मैं ९० फूट की हनुमान जी की मूर्ति भारत के लिए ठीक थी पर शायद अमरीका मैं उचित नहीं है.
ऐसे ही बात बात मैं न्यू यॉर्क के टाइम स्क्वायर मैं नाचना शायद उचित नहीं है.

Inauguration ceremony for the Statue of Union, a 90-foot bronze statue of Hindu deity Hanuman, in Sugar Land, Texas, in Aug. 2024. (Courtesy photo)
पर यह भी हो सकता है की कोई विदेशी षड्यंत्र इस सब के पीछे हो . इस्लामी राष्ट्रों ने अमरीकी यूनिवेर्सिटी और मीडिया पर कब्ज़ा कर रखा है . हमारे पड़ोसी शत्रु भी इसके पीछे हो सकते हैं .
भारत अगले दस वर्षों तक विदेशी भारतियों के द्वारा भेजे गए पैसे पर और युवा विदेशों मैं नौकरियों पर आश्रित रहेंगे .
सरकार को राष्ट्र हित और वैयक्तिक पसंद के बीच सामंजस्य बिठाना होगा और विदेशी शक्तियों की संभावित करतूतों को भी गंभीरता पूर्वक लेना होगा .


