With a far stronger China controlling water flow to most of the Asian rivers the lower riperian countries are helpless .China has made three dams on Brahmputra already. The one in pipelines is the most dangerous. It is located just thirty KMs from border and plans to divert entire water from Himalayan glaciers to main land China. India Bangladesh ,Combodia , Laos , Vietnam are all affected by Chinese ‘Dadagiri but are helpless alone. China refuses to accept Inernational law and is following its plans blatantly.
Water demand in India and China is likely to grow by 50% in coming years . The Tibet region will hold this precious natural resource.
ब्रह्मपुत्र पर चीन की नीयत का सवाल
डॉ. गौरीशंकर राजहंस
डरबन में हुए ‘ब्रिक्स’ सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नवनिर्वाचित चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग के बीच चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर तीन बांध बनाये जाने के बारे में बात हुई है। यह भी खबर है कि भारत के प्रधानमंत्री ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जा रहे तीनों बांधों पर भारत की चिन्ताओं से चीन के राष्ट्रपति को अवगत कराया। भारत पिछले कई वर्षों से कह रहा है कि इन बांधों के बनाए जाने से भारत आने वाले पानी के प्रवाह पर असर पड़ेगा। जबकि चीन का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं होगा। ब्रह्मपुत्र का पानी पहले की तरह ही भारत में आता रहेगा। दोनों नेताओं ने यह फैसला किया कि दोनों देशों के प्रतिनिधि मिल-बैठकर इस समस्या का समाधान ढूंढ़ें। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या चीन की बातों पर भरोसा किया जा सकता है? ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है। तिब्बत में इसका नाम ‘राकलोंग सांगपो’ है। तिब्बत में कुछ दूर बहने के बाद यह नदी सीधे भारत में आ गिरती है जहां इसका नाम ब्रह्मपुत्र है। कुछ वर्ष पहले जब पश्चिम के देशों के समाचारपत्रों में यह खबर प्रकाशित हुई थी कि चीन अपने क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को मोड़कर उत्तर की ओर ले जा रहा है, तब इस बात की आशंका प्रकट की गयी थी कि इसका सीधा असर भारत के असम और उत्तर- पूर्वी राज्यों पर पड़ेगा। सन् 2006 में अमेरिकी गुप्तचर सेटेलाइटों ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर एक बहुत बड़ा डैम बनाने जा रहा है। भारत ने चीन के इस प्रस्ताव का विरोध किया था। चीन ने उस समय भारत को आश्वस्त किया था कि वह ऐसा कोई बांध नहीं बना रहा है। कुछ वर्षों बाद भारत ने अपने सेटेलाइटों से यह पता लगाया कि चीन सचमुच एक विशालकाय बांध ब्रह्मपुत्र नदी पर बना रहा है। भारत ने फिर विरोध किया तो चीन ने सफेद झूठ बोला कि वह एक छोटा-सा बांध बना रहा है जिससे ब्रह्मपुत्र के पानी के बहाव पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उत्तर-पूर्वी राज्यों के आक्रोश को देखते हुए भारत ने फिर से चीन से अपना विरोध दर्ज किया। परन्तु चीन के कानों पर जूं तक नही रेंगी। भारत में लोगों का यह मानना था कि पानी का बहाव हमेशा उत्तर से दक्षिण की ओर होता है। ऐसे में यदि ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के क्षेत्र में कोई डैम बनाया भी गया तो उसे वह उत्तर की ओर कैसे ले जाएगा? माओ-त्से-तुंग ने ’50 के दशक में यह कहा था कि उत्तर चीन में पानी का घोर अकाल है और दक्षिण चीन में जहां ब्रह्मपुत्र नदी बहती है, भरपूर पानी है। उस समय यह कहा गया था कि कितनी भी इंजीनियरिंग कुशलता दिखा दी जाए, दक्षिण का पानी उत्तर में नहीं आ सकता। चीन के शासक उस समय इस लाचारी को देखकर चुप हो गये थे। इधर हाल के वर्षों में चीन में भयानक अकाल पड़ा है। उत्तर चीन में जो खेती लायक ज़मीन थी, वह बंजर हो गई है। चीन का ‘गोबी’ रेगिस्तान संसार के सबसे बड़े रेगिस्तानों में से एक है। वह तेजी से दक्षिण की ओर बढ़ रहा है और चीन के हरे-भरे क्षेत्र को जकड़ रहा है। अत: चीन यह भरपूर प्रयास कर रहा है कि दक्षिण की नदियों के बहाव को मोड़कर उत्तर की ओर ले जाया जाए। पहले के जमाने में ऐसा करना शायद संभव नहीं था। परन्तु आज सारे संसार में खासकर चीन में, इंजीनियरिंग की कुशलता इतनी बढ़ गई है कि वे असंभव काम को संभव कर देते हैं। पश्चिम के देशों के समाचारपत्रों में यह खबर प्रकाशित हुई है कि चीन की सरकार का कहना है कि बड़े-बड़े डैम बनाकर ब्रह्मपुत्र के पानी को दक्षिण से उत्तर की ओर ले जाने में यदि 10-20 हजार श्रमिकों का बलिदान भी हो जाता है तो चीन वह बलिदान करने को तैयार है। बांध बनाने को लेकर चीन की हठधर्मिता को देखकर अब यह आशंका प्रबल हो गई है कि असम समेत उत्तर-पूर्व के राज्यों में पानी का भयानक संकट खड़ा हो जाएगा। गंगा नदी की तरह दक्षिण-पूर्व एशिया में बहने वाली एक विशाल नदी ‘मेकांग’ है जो तिब्बत से निकलती है। अनेक वर्षों से ‘मेकांग’ नदी पर विशालकाय बांध बनाकर लाओस देश बिजली का भरपूर उत्पादन कर रहा था और उस बिजली का 90 प्रतिशत भाग थाईलैंड को निर्यात करता था। यही उसकी आमदनी का मुख्य स्रोत था। चीन ने चुपके से तिब्बत में ‘मेकांग’ नदी पर बड़े-बड़े बांध बनाकर लाओस के क्षेत्र में बहने वाली मेकांग नदी को जलविहीन कर दिया। यह नदी लाओस के अलावा कम्बोडिया और वियतनाम में भी सिंचाई का मुख्य स्रोत है। इन सभी देशों में एक बहुत बड़ा भूभाग सूखाग्रस्त हो गया है। बरसात के मौसम में बाढ़ से बचने के लिए चीन तिब्बत में अपने सारे बांध खोल देता है जिससे इन सभी देशों में भयानक बाढ़ आ जाती है। ऐसी हालत में चीन के झूठे वादों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। डर यह है कि ब्रह्मपुत्र में चीनी क्षेत्र में जो तीन बड़े-बड़े डैम बनाए गये हैं ,उससे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों की भी वही हालत हो जाएगी जो लाओस, कम्बोडिया और वियतनाम की हो गई है। गर्मी के दिनों में वह ब्रह्मपुत्र नदी के पानी का बहाव अपनी ओर कर लेगा जिससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का एक बहुत बड़ा भूभाग सूखे की चपेट में आ जाएगा और वहां अकाल जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। जबकि वह बरसात में सारे बांध खोलकर उत्तर-पूर्व के राज्यों और बंगलादेश को तबाह कर देगा। भारत और चीन के रिश्तों के इतिहास को देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि चीन हमेशा भारत से झूठ बोलता रहा है चाहे वह सीमा का मामला हो या कोई अन्य मामला। चीन अपनी कुटिलता के लिए मशहूर है। अत: उसकी बातों पर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता। चीन तो यह भी कहता है कि यदि ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम चीनी क्षेत्र में बनाए गए तो भारत में ब्रह्मपुत्र नदी की इतनी सहायक नदियां हैं कि ब्रह्मपुत्र में कभी पानी का अभाव नहीं रहेगा। यह आंखों में धूल झोंकने जैसी बातें हैं। किसी भी सहायक नदी (ट्रिब्यूटरी) में पानी केवल बरसात के मौसम में आता है। पूरे साल वहां पानी नहीं रहता है। समय आ गया है जब भारत चीन के इस शत्रुतापूर्ण व्यवहार का डटकर मुकाबला करे और बंगलादेश के साथ मिलकर विश्व समुदाय से अपील करे कि चीन शीघ्रातिशीघ्र अपने क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम बनाना रोके। ब्रह्मपुत्र नदी पर बनने वाले इन बांधों का सामरिक खतरा भी है। युद्ध की हालत में चीन इन बांधों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। बांधों का पानी खोलकर पूर्वोत्तर के बहुत बड़े भूभाग में बाढ़ आ जाएगी जिससे चीनी सेना का मुकाबला करना कठिन हो जाएगा। भारत सरकार को ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जाने वाले डैमों का सशक्त रूप से विरोध करना चाहिये।
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं।)

